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गाँव की लड़की शहर में

ट्रेन से उतरते ही सीता की जान में जान आ गई। वो भगवान का शुक्रिया अदा की। बिहार की ट्रेन में भीड़ ना हो ये कभी हो नहीं सकता। इसी भीड़ में गाँव की बेचारी सीता को अपने पति श्याम के साथ आना पड़ा। श्याम जो कि T.T.E. है। हालाँकि वो भी गाँव का ही है मगर नौकरी लगने के बाद उसे शहर रहना पड़ा। 6 महीने पहले दोनों की शादी हुई थी। शादी के बाद श्याम ज्यादा दिन तक अकेला नहीं रह पाया । काम के दौरान वो काफी थक जाता था। फिर घर आकर खाना बनाने का झंझट। मन नहीं करता खाना बनाने का पर क्या करता? होटल में अच्छा खाना मिलता नहीं । कभी कभी तो भूखा ही रह जाता। ऐसा नहीं है कि वो महँगे होटल में नहीं जा सकता था। मगर सिर्फ पेट की भूख रहती तब ना। उसे तो नई नवेली पत्नी सीता की भी भूख लग गई थी। आखिर क्यों नहीं लगती? सीता थी ही इतनी सुंदर । पूरे गाँव में तो उतनी सुंदर कोई थी ही नहीं। तभी तो उसकी शादी एक नौकरी वाले लड़के से हुई । श्याम जब सीता को पहली बार देखा तो देखता ही रह गया। एकदम चाँद की तरह चमकती गोरी रंग, नशीली आँखें, गुलाबी होंठ,कमर तक लम्बे लम्बे बाल,नाक में लौंग, कान में छोटी छोटी बाली, गले में पतली सी Necklace जिसमें अँगूठी लटकी थी।सफेद रंग की समीज-सलवार में सीता पूरी हुस्न की मल्लिका लग रही थी। दोनों के परिवार वाले देख चुके थे, पर सबकी इच्छा थी कि ये दोनों भी एक-दूसरे को देख लें तो अच्छा रहेगा। सीता अपने भैया-भाभी के साथ श्याम को देखने गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक मंदिर में गई थी।गाँव में शादी से पहले लड़के का घर पर आना तो दूर, बात करना भी नहीं होता है। पर श्याम के परिवार वाले की जिद के कारण एक मुलाकात हो सकी ।
तय समय पर श्याम अपने एक दोस्त के साथ सीता से मिलने गाँव के बाहर मंदिर पर पहुँच गया था। अभी तक सीता नहीं पहुँची थी। दोनों वहीं बाहर बने चबूतरे पर बैठ कर सीता के आने का इंतजार करने लगे। श्याम के मन में काफी सवाल पैदा हो रहे था। अजीब कशमकश था, पता नहीं गाँव की लड़की है कैसी होगी? रंग तो जरूर सांवली होगी। खैर रंग को गोली मारो, अगर शारीरिक बनावट भी अच्छी मिली तो हाँ कर दूँगा। पर अब हाँ या ना करने से क्या फायदा। जब माँ-बाबूजी को रिश्ता मंजूर है तो मुझे बस एक आज्ञाकारी बेटा की तरह उनकी बात माननी थी। सब कह रहे हैं अच्छी है तो अच्छी ही होगी।अच्छा
वो आएगी तो मैं बात क्या करूँगा? साथ में उसके भैया-भाभी भी होंगे तो ज्यादा बात भी नहीं कर पाऊंगा।अगर पसंद आ भी गई तो बात नहीं कर पाऊंगा।फिर तो शादी तक इंतजार करना पड़ेगा। शहर में ही ठीक था। आराम से मिल सकते थे,बात करते, date पर जाते वगैरह वगैरह। पर यहाँ बदनामी की वजह से कुछ नहीं कर सकते भले ही आपकी उससे शादी क्यूँ ना हो रही हो।
तभी मोटरगाड़ी की तेज आवाज से श्याम हड़बड़ा गया।सामने देखा सीता अपने भैया-भाभी के साथ पहुँच गई ।सीता को देखते ही श्याम को जैसे करंट छू गया हो। उसके मन में अब एक ही सवाल रह गया था," गाँव की लड़की इतनी सुंदर कैसे? मैं तो बेकार में ही इतना सोच रहा था"
तभी उसे अपने दोस्त का ख्याल आया। उसकी तरफ देखा तो उसे तो एक और झटका लगा। साला मुँह फाड़े एकटक देख रहा था, मन तो किया दूँ साले को एक जमा के। पर चोरी से ही एक केहुनी दे दिया तो लगा वो भी सो के उठा हो। फिर मेरी तरफ देख के शैतानी मुस्कान दे रहा था साला। खैर हमने उसे एक तरफ करके भैया भाभी को प्रणाम किया। फिर भैया कुछ बहाने से गाड़ी से 5 मिनट में आ रहा हूँ बोल के चले गए।
"आपका नाम?" भाभी मेरे दोस्त की तरफ देखते हुई पूछी
"जी..मैं... मैं... रमेश। श्याम की दोस्त।" आशा के विपरीत हुए सवाल से साला अपना Gender भी भूल गया।
पर भाभी मुस्कुराती हुई बोली,
"रमेश जी, इन्हें कुछ देर के लिए अकेले बात करने देंगे तो अच्छा रहेगा।तब तक हम दोनों कहीं एकांत में चलते हैं।"
रमेश चुपचाप भाभी की तरफ बढ़ने लगा।
"और हाँ श्याम जी... अभी सिर्फ बात करना और कुछ नहीं । मैं पास में ही हूँ, बातें नहीं सुन सकती पर देख जरूर रहुँगी ही..ही...ही" भाभी हँसती हुई रमेश के साथ मंदिर के बाहर निकल गई।
अब मैं भला क्या बात करता? सामने साक्षात परी जैसे लड़की खड़ी जो थी। मैं सिर्फ नाम ही पूछ सका। आवाज भी इतनी मीठी कि कोयल भी शर्मा जाए। बाकी के 10 मिनट तो बस सीता को देखता ही रहा। गजब की थी सीता। ऊपर से नीचे तक देखा पर कहीं से भी मुझे कमी नजर नहीं आई।वो अपनी नजरें नीची किए हुए मंद मंद मुस्कुराती रही। कभी कभी जब मेरी तरफ देखती तो लगता अपने आँखों से ही मुझे घायल कर देगी।
तभी मुझे भाभी और रमेश आते हुए दिखे। मुझे तो उम्मीद ना की ही थी, फिर भी फोन के लिए पूछ लिया। वो ना में गर्दन नचा दी। पर मैं फिर भी काफी खुश था।
"क्यों श्याम जी, बात तो कुछ किए नहीं! लगता है आपको हमारी सीता पसंद नहीं आई। घर जाकर बाबूजी को मना कर दूँ क्या?" भाभी आते के साथ ही पूछ बैठी।
"नहीं..नहीं.. भाभी जी। मुझे तो पसंद है बाकी इनसे पूछ लो" हड़बड़ाते हुए मैंने कहा जैसे किसी बच्चे से टॉफी माँगने पर बच्चा हड़बड़ा जाता हो।
मेरी बात सुनते ही सब ठहक्का लगा कर हँसने लगे। मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ तो मैं भी शर्मा के मुस्कुरा दिया।
"तब तो लगता है कि जल्द ही आप दोनों फँसोगे क्योंकि सीता को भी आप पसंद आ गए" भाभी बोली
"पर भाभी जी आपने तो इनसे पूछा ही नहीं फिर कैसे आप समझ गई?" तभी रमेश बोल पड़ा।
"क्यों ? आपके दोस्त के पास क्या कमी है जो पसंद नहीं आएँगे? अच्छे खासे गबरु जवान लग रहे हैं। बॉडी भी काफी अच्छा है। दिखने में भी अच्छे हैं। सरकारी नौकरी करते हैं। मैं अगर कुवांरी रहती तो मैं ही शादी कर लेती इनसे।" एक बार फिर हम सबको हँसी आ गई भाभी की बात पर। तभी मोटरगाड़ी की आवाज सुनाई दी। भैया भी तब तक आ गए। हमें एक अच्छे लड़के की तरह घर जाना ठीक लगा अब। मैंने उन लोगों से इजाजत ले कर रमेश के साथ निकल गया।
दोनों की शादी बड़े ही धूमधाम से हुई। श्याम अपने सुहागरात को ले काफी व्याकुल था। आखिर क्यों ना हो इतनी सुंदर बीबी जो मिली ।लाल जोड़ों में तो सीता और भी कहर ढा रही थी। सुहागरात के लिए सीता कोई खास सोची नहीं थी।
थोड़ी सी डर जरूर थी कि पहली बार सेक्स करूँगी तो पता नहीं कितना दर्द होगा। भाभी कहती थी कि पहली बार दर्द होती है, मैं सह भी पाऊंगी या नहीं। अगर ना सह पाई तो कहीं नाराज हो गए तो क्या करूँगी।हमें तो ठीक से मनाना भी नहीं आता।इसी उधेड़बुन में खोई सीता पलंग पर बैठी थी।
तभी हल्की आहट से दरवाजा खुला और श्याम अंदर आ गए।सीता देखते ही उठ के खड़ी हो गई।
"अरे ! खड़ी क्यों हो गई?" श्याम प्यार भरी व्यंग्य से सीता से पूछा।
कुछ सोचने के बाद सीता फिर से बैठ गई और श्याम को हल्की नजरों से देखने लगी।
श्याम तो बेसब्र था ही अपने मिलन को लेकर, पर सीता को महसूस नहीं होने देना चाहता था कि मैं व्याकुल हूँ। उसने एक गंजी और तौलिया पहन रखा था। वो सीता के पास आकर बैठ गया और सीता को देखने लगा। सीता अपने तरफ देखते देख शर्मा कर अपनी नजरें दूसरी तरफ कर ली।
"क्या हुआ? डर लग रहा है क्या?" श्याम धीरे से पूछा
कोई जवाब ना पाकर श्याम बोला," मैडम, हम दोनों शादी किए हैं।कोई प्रेमी नहीं हैं जो डर रही हैं। आज हमारी पहली रात है तो थोड़ी शर्म हमें भी आ रही है।अगर आपकी इजाजत हो तो हम ये शर्म दूर कर लें।" श्याम ने सलाह और सवाल दोनों एक साथ कर दिए।
अब बेचारी सीता क्या कहती? श्याम कुछ जवाब ना पाकर सीता के और निकट हो गया और गले से लगा लिया। सीता का चेहरा शर्म के मारे लाल हो गया था। आज जिंदगी में पहली बार किसी मर्द ने छुआ था। मर्द की बाँहेँ औरत को कितना आनंद देती है, बेचारी सीता को क्या मालूम? अभी तो वो बस श्याम के सीने में सहमी सटी हुई थी।
सीता की तरफ से कोई Response ना पाकर श्याम थोड़ा परेशान होने लगा, मगर आज पहली मुलाकात की वजह से ज्यादा कुछ करना ठीक नहीं समझा। उसने सीता के दोनों कंधे पकड़ कर हल्के से अलग किया। फिर अपना चेहरा सीता के काफी निकट ले जाकर धीमी आवाज में कहा," I Love you सीता ! पता है पहली बार तुम्हें देखते ही मुझे प्यार हो गया था। उस दिन से मैं तुम्हारा पल-पल इंतजार कर रहा हूँ।अपने दिल का हाल कहना था तुमसे।ढेर सारा प्यार करना चाहता हूँ तुमसे और तुम्हारी ढेर सारी बातें सुननी थी हमें।"
सीता नजरें नीची किए मूक बनी बैठी थी
सीता के बगल में बैठा श्याम कंधों पर हाथ रखकर सीता के गालोँ को सहलाने लगा। स्पर्श पाकर सीता अजीब रोमांच से भर गई। श्याम अब अपना चेहरा सीता के कंधों पर रख दिया जो कि सीता के गालोँ से सट रही थी। सीता का रोम रोम श्याम के गर्म साँसोँ से सिहर गया। सीता के जिस्म की खुशबू श्याम को मदहोश कर रही थी। श्याम अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर सीता के चेहरे को अपनी तरफ किया जिससे सीता के होंठ श्याम के होंठ के काफी निकट हो गए। दोनों की गर्म साँसें टकरा रही थी। सीता आगे होने वाली का चित्रण को याद कर तेज साँसें लेने लगी और उसके होंठ कंपकंपाने लगे। श्याम ज्यादा देर करना उचित नहीं समझा और होंठ सीता के तपते होंठों से चिपका दिए।
श्याम तो जैसे स्वर्ग में पहुँच गया सीता के अनछुई होठोँ का रस पाकर। सीता के तो अंग अंग सिहर गए अपने जीवन की पहली चुंबन से। अंदर से वो भी काफी उत्तेजित हो गई थी मगर शर्म की वजह से बर्दाश्त कर रही थी। मगर बकरा कब तक अपने जीवन की खैर मनाती। श्याम जैसे ही सीता के चुची पर अपना हाथ रखा, सीता चिहुँक के श्याम को दोनों हाथों से जकड़ ली। श्याम तो अब और कस के होठोँ को चुसने लगा और चुची को धीमे धीमे दबाने लगा।कुछ ही देर में जोरदार चुंबन से सीता की साँसे उखड़ने लगी थी। मगर श्याम इन सब से अनभिज्ञ लगातार चूसे जा रहा था। अंततः सीता बर्दाश्त नहीं कर पाई और अपने होंठ पीछे खींचने लगी तब श्याम को महसूस हुआ। श्याम के होंठ अलग होते ही सीता जोर जोर से साँस लेने लगी और सामान्य होने की कोशिश करने लगी। श्याम के हाथ अभी भी सीता के चुची को सहला रहा था।
कुछ सामान्य होने पर श्याम ने सीता को प्यार से पूछा," जान, तुम इतनी मीठी हो कि हमें पता ही नहीं चला कि अब ज्यादा हो गया है और तुम्हें दिक्कत हो रही है।"
अब तक शायद सीता में भी कुछ हिम्मत आ गई थी। वो शर्माती हुई बोली," कम से कम साँस भी तो लेने देते।"
"ओह जान सॉरी ! आगे से ख्याल रखूँगा।"कहते हुए सीता को अपनी बाँहो में समेट लिया। सीता भी मुस्कुराती हुई श्याम के सीने से चिपक गई।
"जान! जब होंठ इतने रसीले हैं तो और चीज कितनी रसीली होगी।" श्याम थोड़ा मजाकिया मूड में पूछा
सीता शर्म से कुछ बोल नहीं पा रही थी,बस मुस्कुरा रही थी।
कुछ देर चिपके रहने के बाद श्याम हटा और अपना गंजी खोलते हुए कहा,"जान अब इन कपड़ों का कोई काम नहीं है सो अब तुम भी हटाओ अपने कपड़े।" श्याम अब सिर्फ अंडरवियर में था जिसमें उसका लण्ड अंगराई ले रहा था। सीता तिरछी नजरों से देखी तो एक बारगी डर गई मगर चेहरे पर भाव नहीं आने दी।श्याम सीता के पास आ कर साड़ी के पल्लू खींच दिया। सीता की तो सिसकारी निकल गई।अगले ही पल साड़ी जमीन पर बिखरी पड़ी थी। सीता की पीठ पर एक हाथ रख अपने से चिपका लिया और ब्लाउज के हुक खोलने लगा। ब्लाउज खुलते ही मध्यम आकार की चुची बाहर आ गई जो कि सफेद रंग की ब्रॉ में कैद थी।श्याम ब्रॉ के ऊपर से ही चुची जोर से मसल दिया। सीता की उफ्फ निकल गई।
अगले ही क्षण तेजी से श्याम ने पेटीकोट का नाड़ा भी खोल दिया। सीता तो शर्म से मरी जा रही थी। श्याम पति है मगर पहली बार पति के साथ भी लड़की को काफी शर्म आती है। यही हाल सीता की भी थी। बेचारी शर्म से श्याम के सीने से चिपक गई। श्याम ने भी मौका मिलते ही ब्रॉ भी अलग कर दिया। अब दोनों सिर्फ पेन्टी में चिपके थे।
सीता तो साक्षात काम देवी लग रही थी। पैरों में पायल, हाथ में मेँहदी, कलाई में चूड़ी, गले में मंगलसूत्र जो चुची तक लटक रही थी, नाक में छोटी सी रिंग, कान में झुमका,माथे पे माँगटीका, कपड़ों में मात्र एक छोटी सी पेन्टी। कुल मिलाकर इस वक्त सीता किसी मुर्दे का भी लण्ड खड़ा कर देती। श्याम तो जिन्दा था। उसे तो लण्ड के दर्द से हालत खराब थी। अब अंडरवियर के अंदर रखना मुश्किल था तो उसने बाहर कर दिया और सीता के नरम हाथों में थमा दिया। सीता तो चौंक पड़ी लण्ड की गरमी से। उसे तो लग रहा थी कि हाथ में छाले पड़ जाएँगे।
"जान, अपना हाथ आगे-पीछे करो ना।"गालोँ को काटते हुए श्याम बोला
सीता तो इन सब से अनजान थी तो भला वो क्या करती। फिर भी अनमने ढंग से करने लगी।
कुछ ही क्षण में लण्ड के दर्द से श्याम कुलबुलाने लगा। सीता का हाथ हटा दिया और गोद में उठा बेड पर सुला दिया। बेड के नीचे से ही श्याम ने पेन्टी को निकाला। ओफ्फ ! चूत देखते ही श्याम को नशा लग गया। एकदम चिकनी गुलाबी रंग, हल्की हल्की बाल, कसी हुई फाकेँ, पूरी मदहोश करने वाली थी।एक जोरदार चुंबन जड़ दिया श्याम ने। सीता तड़प उठी। श्याम ने चुंबन के साथ ही अपना जीभ चलाने लगा।सीता अपना सर बाएँ दाएँ करके तड़पने लगी। श्याम के बाल पकड़ के हटाने लगी मगर श्याम तो चुंबक की तरह चिपका था। उसकी चूत पानी छोड़ने लगी थी। नमकीन पानी मिलते ही और जोर जोर से चुसने लगा। सीता ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकी।
चंद मिनट में ही सीता की चीख निकल गई और झड़ने लगी। श्याम सारा पानी जल्दी जल्दी पीने लगा। जीभ से पानी की एक एक बूँद श्याम ने चाट के साफ कर दिया। सीता बदहवास सी आँखे बंद कर जोर जोर से साँसे ले रही थी। श्याम मुस्कुराता हुआ उसके बगल में आ के लेट गया और सीता को अपनी बाँहो में भर के उसके माथे को चूमने लगा।

श्याम का लण्ड अभी भी पूरा तना हुआ था। उसने एक पैर सीता के पैरों पर चढ़ा दिया, जिससे लण्ड सीधा सीता की गुलाबी चूत पर दस्तक दे रही थी। श्याम सीता को चूमते हुए कहा,"जानू, तुम तो इतनी जल्दी खल्लास हो गई। अभी तो असली मजा तो बाकी ही है।"
सीता बस मुस्कुरा कर रह गई।
श्याम उठ के सीता के मुँह के पास बैठ गया जिससे उसका तना लण्ड सीता के होंठ के काफी नजदीक ठुमके लगा रहा था।पर सीता आँखें बंद की अभी भी पड़ी थी।
श्याम ,"जान, अब मैं तुम्हें एक पूरी औरत का एहसास दिलाना चाहता हूँ, अपनी आँखें खोलो और इसे प्यार करो।"
सीता सुनते ही एकबारगी तो चौंक पड़ी। फिर आँखें खोली तो सामने लण्ड देख जल्दी से अपना मुँह दूसरी तरफ कर ली।
श्याम,"अरे! क्या हुआ? जब तुम मेरे लण्ड को प्यार नहीं करोगी तो मैं इसे तुम्हारी चूत में कैसे डालूँगा और तुम्हें पूरी औरत कैसे बनाऊंगा।"
सीता शर्माती हुई बोली,"गंदा मत बोलो ना और आप नीचे हो जाओ मैं हाथ से कर देती हूँ।"
श्याम,"हाथ से नहीं डॉर्लिँग मुँह से प्यार करना है और गंदा क्या है लण्ड को लण्ड ना बोलूँ तो क्या बोलूँ?"
सीता के शरीर में तो मानो 1000 वोल्ट का करंट लग गया।आज तक बेचारी एक किस तक नहीं की थी उसे मुँह में लण्ड लेने को कहा जो जा रहा था।सीता सकुचाते होते हुए बोली,"छीः! मुँह में गंदा नहीं लूँगी।"
"कुछ गंदा नहीं है मेरी रानी। मुँह में लोगी तो और मस्त हो जाओगी। आज मना कर रही हो अगली बार खुद ही लपक कर लोगी।"
"नहीं आज नहीं प्लीज।और जो करना है कर लीजिए मगर ये नहीं कर सकती" सीता बोली।
अब श्याम ज्यादा दबाव नहीं देना चाहता था क्योंकि आज पहली रात थी दोनों की।
"OK. बस एक किस ही कर दो और ज्यादा कुछ नहीं प्लीज" श्याम अब और ज्यादा प्यार से कहा।
सीता भी श्याम को नाराज नहीं करना चाहती थी।हल्की मुस्कान के साथ बोली," केवल एक किस।"
श्याम को तो जैसे मन की सारी इच्छा इतनी में ही पूरी हो गई पूरा चहकते हुए बोला," हाँ हाँ डॉर्लिँग बस एक किस ।"
"ठीक है तो अपनी आँखें बंद कीजिए ।मुझे शर्म आएगी" सीता बोली।
श्याम अब ये मौका जाने नहीं देना चाहता था तो उसने जल्दी से अपनी आँखें बंद कर ली। सीता अभी भी लण्ड को मुँह से नहीं लगाना चाहती थी मगर हाँ कर दी थी तो क्या करती? अब अगर मना करती है तो कहीं श्याम नाराज हो गए तो? फिर भी काफी हिम्मत करके एक हाथ से लण्ड पकड़ी और अपने होंठ लण्ड के निकट ले जाने लगी। श्याम की तो सिर्फ छूने से ही सिसकारी निकल रही थी। जैसे ही सीता के होंठ लण्ड को छुआ श्याम की आह निकल पड़ी। सीता श्याम को मस्ती में देख कुछ देर तक अपना होंठ लण्ड पर चिपकाए रखी।सीता को अच्छा नहीं लग रहा था मगर वो श्याम के लिए ऐसा कर रही थी।कुछ देर बाद सीता हटने की सोची तो उसने पूरा सुपाड़ा अपने होठोँ में ले किस की आवाज के साथ हटा ली और जल्दी से अपना चेहरा हाथ से ढँक ली।
श्याम को तो ऐसा लग रहा था कि उसका लण्ड अब पानी छोड़ देगा। किसी तरह रोक के रखा और सीता की गालोँ पर चुंबन के साथ शुक्रिया अदा किया।
श्याम अब उठा और सीता के मेकअप बॉक्स में से क्रीम निकाला और अपने लण्ड पे मलने लगा। फिर वो सीता की चूत को चूमते हुए उसकी चूत में भी क्रीम लगाने लगा। सीता को ठंड महसूस हुई तो हल्की नजरो से देखने लगी कि क्या लगा रहे हैं। अपनी तरफ देखती पाकर श्याम बोला,"डॉर्लिँग, क्रीम लगा रहा हूँ ताकि आपको दर्द कम हो।" और श्याम मुस्कुरा दिया।
सीता शर्माती हुई एक बार फिर चेहरा ढँक ली।
श्याम ने सीता के दोनों पैरों को मोड़कर सीने से सटा दिया। अब सीता की फाकेँ काफी हद तक खुल रही थी काफी कसी चूत के कारण पूरी नहीं खुली थी वर्ना इस मुद्रा में तो अक्सर की चूत खुल जाती है।सीता की तो साँसें अब रुक रही थी आगे होने वाले स्थिति को सोचकर।श्याम ने अपनी उँगली से चूत की दरार को फैला कर अपना लण्ड टिका दिया और हल्का धक्का लगाया। मगर लण्ड फिसल गया। पुनः उसने चूत और ज्यादा से खोल कर थोड़ा जोर का धक्का लगाया।
सीता जोर से अपनी आँखें भीँचते हुए चिल्ला पड़ी," आआआआआआहहहहह..... ओह ओहओफ्फ ओफ्फ ई ई ईईईईईईई मर गईईईईईई प्लीज निकालीए बाहरररर आहआह..."
"बस रानी थोड़ा बर्दाश्त कर लो फिर मजा आएगा" श्याम पुचकारते हुए कहा।
श्याम का लण्ड 2 इंच तक घुस गया था।
श्याम ने अपना लण्ड खींचते हुए एक और झटका दे दिया। इस बार 4 इंच तक घुस गया।
"ओफ्फ....माँआआआआईईईईईईई मरररर गईईईईईईईई अब और नहीं सह पाऊंगी। प्लीज बाहर निकालीएएएए" सीता रोनी सूरत बनाते हुए बोली।
"अच्छा अब नहीं करूँगा।" श्याम कहते हुए सीता की होंठ चुसने लगे और चुची मसलने लगे। कुछ देर चुसने के बाद जब सीता थोड़ी नॉर्मल हुई तो श्याम ने सीता के होठोँ को कस के चुसते हुए अपना लण्ड पीछे खींचा और बिना कहे पूरी ताकत से धक्का दे मारा।
"आआआआआआआ मम्मी मर गईईईईईईई आह आह ओफ्फ ओह प्लीज मैं आपके पैर पकड़ती हूँ बाहर निकाल लीजिए आआआआइसइस" सीता की आँखें आँसू से भर गई थी और छूटने की प्रयास कर रही थी।जिंदगी में पहली बार उसे इतना दर्द हुआ था वो भी चुदाई में, कल्पना भी नहीं की थी बेचारी। ऐसा लग रहा था मानो चाकू से किसी ने उसकी चूत चीर दिया हो।श्याम का पूरा लण्ड सीता की छोटी सी चूत में समा गया था और उसके बॉल सीता की गांड के पास टिकी थी।श्याम सीता के होंठ चूमते हुए कहा," बधाई हो सीता रानी। अब आप लड़की से पूरी औरत बन गई हैं।"
सीता बेचारी कुछ ना बोल सकी।श्याम लण्ड पेले ही सीता की चुची मसल रहा था और होंठ लगातार चूसे जा रहा था। काफी देर बाद जब दर्द थोड़ी कम हुई तो श्याम ने अपना पूरा लण्ड बाहर निकाला और जोर से पेल दिया।
"आहहहहहह उम्मउम्मउम्म" सीता एक बार फिर कराह उठी।
"बस रानी। आज पहली बार है ना इसलिए दर्द ज्यादा हो रहा है।आज सह लो फिर पूरी जिंदगी मजे लेती रहना।"श्याम ने कहा और कहकर सीता को पेलने लगा।

लण्ड अब लगातार सीता की चूत को चीर रही थी। सीता अभी भी दर्द से बेहाल थी।वो लगातार कराह रही थी मगर श्याम तो अब और जोर जोर से पेलने लगा। अपना लण्ड पूरा बाहर निकालता और एक ही झटके में जड़ तक घुसेड़ देता। वो सीता की कुंवारी चूत की लगातार धज्जियाँ उड़ा रहा था।
कुछ पलोँ में श्याम की रफ्तार तेज हो गई।उसकी मुँह से भी आवाजें निकल रही थी अब।
"आह सीता ओहहहहह मेरी जान। कितनी प्यारी हो तुम। ओफ्फ ओह कितना मजा आ रहा है तुम्हें चोदने में।क्या रसीले होंठ पाई है एकदम मीठी। आहआह आह आह मैं तो धन्य हो गया तुम्हें पाकर।" श्याम ऐसे ही बोलते हुए सीता को अब तेज तेज धक्के लगा रहा था।
अचानक श्याम की चीख निकलनी शुरू हो गई। श्याम अपने गर्म गर्म पानी से सीता की चूत को भर रहा था। उस पानी की गर्मी को सीता बर्दाश्त नहीं कर सकी और वो भी श्याम को जोर से गले लगाती हुई पानी छोड़ने लगी। सीता को लग रहा था जैसे उसकी चूत में पिचकारी छोड़ रहा हो कोई। दोनों झड़ने के काफी देर बाद तक यूँ ही पड़े रहे। फिर श्याम उठकर बाथरूम में साफ करने चला गया। सीता उठ के अपनी चूत की तरफ देखी तो बेहोश होते होते बची।पूरी तरह सूज गई थी और उसमें से खून और लण्ड के पानी का मिश्रण टपक रही थी। बेडसीट भी खून से पूरी तरह लाल हो चुकी थी। बेचारी सीता को अपनी इस हालत को देखकर रोना आ गया और सुबकने लगी। सीता कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे? इतने में श्याम बाथरूम से वापस आ गया। श्याम का लण्ड सिकुड़ गया था फिर भी सीता को डर लग रहा था। सीता को सुबकती देख पूछे,"जान, दर्द तेज हो रही है क्या? पहली बार चुदाई में इतना ही दर्द होता है। मेरा लण्ड भी देखो छिल गया है। चलो बाथरूम साफ करते हैं।"
श्याम ने सीता की बाँह पकड़ उठने में सहायता की। फिर गोद में उठाकर बाथरूम में ले जाकर एक टेबल पर बैठा दिए। फिर पानी से सीता की चूत को अच्छी तरह से साफ किया। बेचारी सीता तो सोची भी नहीं थी कि कोई उसकी चूत को इतना प्यार देगा। वो तो शर्म से मरी जा रही थी। फिर तौलिया से चूत को अच्छी तरह पोँछा। फिर सहारा देकर बेडरूम तक ले आया।सीता की पैर जवाब दे चुकी थी। कोई भी देखता तो जरूर कहता कि इसकी तबीयत से चुदाई हुई है। अंदर आकर श्याम ने सीता को सुला दिया। सीता साड़ी उठाकर पहनना चाह रही थी मगर श्याम ने रोक दिया,"जान, तुम ऐसे ही काफी सुंदर लग रही हो तो कपड़े पहनने की क्या जरूरत?"
सीता शर्मा कर रह गई और फिर दोनों नंगे ही सो गए।

सुबह 5 बजे मेरी नींद खुली तो अपनी हालत देख खुद शर्मा गई। मैं पूरी मादरजात नंगी श्याम के नंगे जिस्म से चिपकी थी। मैं उठी तो मेरी नजर बेडसीट पड़ी, बेडसीट पर खून और वीर्य के काफी गहरी दाग बन चुकी थी। मैंने अपने कपड़े पहने।फिर श्याम को नींद से जगाई तो वो भी देख मुस्कुरा दिए। मैंने जल्दी से बेडसीट बदली और दूसरी बिछा दी। तब तक श्याम भी अपने कपड़े पहने और फिर सो गए। नींद तो हमें भी आ रही थी किंतु नई जगह थी तो देर तक सोती तो पता नहीं सब लोग क्या सोचते?
कुछ देर बाद घर के सारे सदस्य भी जग चुके थे। मैं भी नहा-धो कर फ्रेश हो गई और नाश्ता कर अपने रूम में आ गई।
सुबह 11 बजे तक श्याम सोते रहे। फिर उठ कर फ्रेश हुए और बाहर अपने दोस्तों के साथ निकल गए। उनके जाते ही हमारी ननद पूजा आ धमकी। सुबह से तो श्याम थे तो शायद इसीलिए नहीं आई।
"भाभी, भैया को सोने नहीं दिए क्या रात में जो इतनी देर तक सोते रहे?"पूजा हँसती हुई बोली।
उसकी बात सुन मुझे भी हँसी आ गई।
पूजा सबकी लाडली थी घर में। अभी वो 12वीं की परीक्षा दी थी।दिखने में भी सुंदर थी काफी। हमेशा हँसती हुई रहती थी। शारीरिक संरचना भी अच्छी थी।
पूजा अब बेड पर चढ़कर मुझे पीछे से बाँहों में भर ली। फिर अपनी गाल मेरी गाल से सटाते हुए बोली,"भाभी बताओ ना प्लीज, रात में क्या सब की?"
"आप अपने भैया से पूछ लीजिए कि रात में क्या सब किए ?" मैं हँसती हुई कह दी
"क्या...भाभी....? भैया से कैसे पूछ सकती।बताओ ना प्लीज।"
"नहीं पूछ सकते तो रहने दीजिए। आपकी भी शादी होगी तो खुद जान जाइएगा।"
"1 मिनट भाभी। ये आप आप क्या लगा रखी है। मैं अपनी भाभी से दोस्ती करने आई हूँ और आप हैं कि....?"
"ओके पूजा।"
"Thanks भाभी। अच्छा ये तो बताओ मेरी बेडसीट कहाँ है जो कल बिछाई थी"
"क्या? वो तुम्हारी बेडसीट थी।"
"हाँ मेरी सीता डॉर्लिँग। जरा दिखाओ तो क्या हालत कर दी।" कहते हुए पूजा मेरी गालोँ को चूम ली
"नहीं, अभी वो देखने लायक नहीं है। मैं साफ कर दूंगी तब देखना"
"सीता भाभी, तुम तो अभी कपड़े साफ करोगी नहीं। अगर जल्दी साफ नहीं होगी तो दाग ज्यादा आ जाएँगे। सो प्लीज हमें दे दो मैं साफ कर दूंगी। प्लीज निकालो।"
"ठीक है मगर किसी को दिखाना नहीं वर्ना सब हँसेगे।"मैंने खुद को पूजा की बाँहों से अलग होते हुए कहा।
"क्या? देखेंगे नहीं तो कैसे समझेंगे कि दुल्हन संस्कारी है।"
"पागल कहीं की मरवाएगी हमें।जाओ हमें नहीं साफ करवानी।" मैं पलंग पर बैठते हुए बोली।
"ही ही ही ही ही। मजाक कर रही थी भाभी। वो सब दिखाने वाली चीज होती है क्या। अब दो" पूजा जोर से हँसती हुई बोली।
मैंने अपनी सूटकेस खोल के ज्योंही बेडसीट निकली, पूजा लपक के ले ली और फूर्ति से बेडसीट पलंग पर फैला दी और चिल्ला पड़ी।
"हाय! मेरी प्यारी भाभी की कितनी धुनाई हुई है पूरी रात । बेडसीट देख कर तो हम जैसी तो डर से शादी भी नहीं करूँगी।.....भाभी, रात में ज्यादा फटी तो नहीं ना।"
मैं शर्म से लाल हो गई और फिर जल्दी से बेडसीट समेटने की कोशिश करने लगी।पूजा तेजी से मेरे दोनों हाथ पकड़ ली और मुझे पलंग की धक्का देती हुई खुद भी मेरे शरीर पर गिर पड़ी। मैं नीचे पड़ी थी और पूजा ऊपर से दबाये थी।
"भाभी, रात में जब मजे ले रही थी तब तो शर्म नहीं आई, फिर अभी शर्म क्यूँ आ रही है।" पूजा अपना चेहरा मेरे चेहरे से लगभग सटाती हुई बोली।
"पागल मरवाएगी हमें अगर आपके भैया को मालूम पड़ेगी तो पता है क्या होगा?" मैं भी आराम से पूजा को समझाने की कोशिश की।
"कुछ नहीं होगा क्योंकि हम दोनों में से कोई भैया को कुछ नहीं कहने वाले हैं। वैसे भाभी आपकी होंठ काफी मस्त हैं। मन तो होती है चिपका दूँ...."
पूजा आगे कुछ करती उससे पहले ही मैंने धक्का देते पूजा को अपने से दूर किया। पूजा अलग होते हुए जोर से हँसने लगी। मैं भी मुस्कुरा दी।
फिर पूजा बेडसीट समेट ली और अपने साथ लाई बैग में डाल ली।
"भाभी, अपने दोस्त के यहाँ जा रही हूँ। वहीं दोस्त के यहाँ साफ कर दूंगी। चिन्ता मत करना किसी को नहीं दिखाऊँगी। शाम तक आ जाऊंगी।" पूजा बैग कंधे पर टिकाती हुई बोली।
मैं भी मुस्कुरा दी और बोली,"ठीक है। जल्दी आना, अकेले बोर हो जाऊंगी।"
फिर पूजा बाय कह कर निकल गई।
11 बज गए थे। अब हमें भी नींद आने लगी थी। बेड पर पड़ते ही मुझे नींद आ गई और मैं सो गई......

रात की थकावट से मैं सोई तो बेसुध सोती रही। अचानक मुझे अपने होंठ पर कुछ गीला सा महसूस हुआ मगर मेरी नींद नहीं खुली। तभी मेरी होंठ में तेज दर्द हुई जिससे मैं हड़बड़ा के नींद से जगी।
ओह....गॉड, एक लड़की मुझे अपनी बाँहों में जकड़ी होंठ चुस रही थी। मैं पहचान नहीं सकी। किसी तरह उसे धक्का दे कर अपने से अलग किया। अलग होते ही वो और पूजा जोर से हँसने लगी। मुझे तो गुस्सा भी आ रही थी मगर पूजा को देख अपने आप पर कंट्रोल की।
"भाभी, ये लो बेडसीट। पूरी तरह साफ हो गई।ये मेरी दोस्त है, इसी के यहाँ साफ करने गई थी। काफी मेहनत करनी पड़ी हम दोनों को तब जाकर साफ हुई है।" पूजा हँसती हुई बोली।
"वो तो ठीक है मगर ये गंदी हरकत क्यों की तुम दोनों।" मैंने लगभग डाँटते हुए पूछा।
"भाभी, इतनी मेहनत से साफ की आपकी बेडसीट तो क्या बिना कुछ लिए थोड़े ही छोड़ दूंगी। पिँकी तो अपना हिस्सा ले ली, अब हमें भी जल्दी से दे दो।"पूजा मेरी पलंग पर चढ़ते हुए बोली।
मैं कुछ बोलती उससे पहले ही पिँकी बोल पड़ी," भाभीजी, सोते हुए आप इतनी प्यारी लग रही थी कि मैं बर्दाश्त नहीं कर सकी और चिपका डाली। वो तो पूजा ही लेने वाली थी मगर मैंने ही रोक दी वर्ना और बुरी हालत कर देती ये"
दोनों की चुहलबाजी सुन के मेरी भी गुस्सा शांत हो गई।
"तुम दोनों पागल हो गई हो। कम से कम जगा तो देती।"मैंने हँसते हुए दोनों से एक साथ सवाल कर दी।
इतना सुनते ही पूजा झट से मेरी तरफ लपकी। मैं कुछ समझती या करने की सोचती, तब तक मैं पलंग पर पड़ी थी और पूजा मेरे दोनों हाथ जकड़ी चढ़ी थी मुझ पर। हम सब को हँसी आ गई पूजा की इस हरकत से। पूजा की हरकतेँ अच्छी लगने लगी थी हमें सो मैं भी बिना कुछ किए पूजा के नीचे पड़ी थी।
पूजा की चुची मेरी चुची को दबा रही थी। फिर पूजा मेरी गालोँ को चूमते हुए बोली,"सीता डॉर्लिँग, आप मना भी करती तो मैं ले ही लेती। मगर मान गई ये आपके लिए अच्छी बात हुई वर्ना वो हाल करती जो भैया भी नहीं किए हैं....."
"चल चल...बड़ी आई हालत खराब करने वाली। आपके भैया भी इसी तरह बोलते थे मगर थोड़ी तकलीफ के बाद सब ठीक हो गई।" मैं भी ताने देते हुए बोली।
हम दोनों की बातें सुन पिँकी भी हँसती हुई पास आई और बोली," भाभीजी,अब तो आपकी खैर नहीं। पूजा वो सब करती है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकती और आपकी ऐसी हालत कर देगी कि आप तड़प तड़प के छोड़ने की भीख मांगोगी।"
तभी बाहर से मम्मी जी की आवाज सुनाई दी। पूजा जल्दी से उठी, मैं भी जल्दी से उठी और और अपने कपड़े ठीक की।
"पूजा, केवल बात ही करोगी। बहु सुबह ही खायी थी,अभी कुछ नाश्ता बना दो और पिँकी को भी खिला दो।काफी दिन बाद आई है।"मम्मी आती हुई बोल पड़ी।
"ठीक है मम्मी।"पूजा बोली
इतना आदेश दे कर मम्मी जी चली गई।शायद उन्हें कहीं जाना था।
"पूजा,मैं अब लेट हो जाऊंगी। मैं भी चलती हूँ" पिँकी भी हम दोनों की तरफ देखते हुए बोली।
"क्यों, इतनी जल्दी क्या है? नाश्ता कर लीजिए फिर चले जाइएगा।"मैंने पिँकी से पूछ बैठी।
"नहीं भाभीजी, फिर आऊंगी तो खाना ही खाऊंगी आपके साथ। आज मम्मी को कुछ काम है इसलिए जाना होगा।पूजा से पूछ लीजिए।"पिँकी अपनी सफाई देते हुए बोली। मैं पूजा की तरफ देखने लगी। पूजा भी हाँ बोली और पिँकी को छोड़ने बाहर निकल गई।
कुछ देर बाद पूजा के बैग से मोबाइल के कंपन की आवाज आने लगी। मैंने पूजा को बुलाने गेट की तरफ लपकी मगर तब तक दोनों बाहर निकल चुकी थी। मैं बाहर जा नहीं सकती थी।खिड़की से बाहर देखी तो दोनों सड़क किनारे बात कर रही थी। अब तो मेरी आवाज निकल भी नहीं सकती थी। इधर तब तक मोबाइल कट चुकी थी। मैं बैग से मोबाइल निकाली और देखने लगी कि किसका फोन था। कोई नया नम्बर था। तभी फिर से फोन आने लगी।बाहर पूजा को देखी तो वो अभी भी बात कर रही थी। मैं सोची उठा कर देखती हूँ कि कौन है और कह दूंगी कि कुछ देर बाद बात कर लेना पूजा से।
मैंने फोन रिसीव की और कान में लगाई।
"क्यों शाली, फोन क्यों नहीं उठाती हो"
मैं तो सन्न रह गई।किसी मर्द की आवाज थी। मर्द तक तो बर्दाश्त करने लायक थी मगर उसकी ऐसी भाषा। से तो मेरी गले से नीचे नहीं उतर रही थी।फिर मैंने थूक निगलते हुए पूछी,"आप कौन बोल रहे हैं और कहाँ फोन किए हैं?"
"तुम पूजा ही हो ना?" उधर से आवाज आई।
अब तो मेरा दिमाग काम करना लगभग बंद हो चुकी थी।मैंने पूजा को देखी तो वो अब वहाँ पर नहीं थी। शायद बातें करते हुए आगे निकल गई। मैंने अपने आप पर काबू पाने की कोशिश की और सोचने लगी कि क्या कहूँ? कुछ देर सोचने के बाद मैंने फैसला ले ली और फोन को कान में सटा ली।
"हाँ मैं पूजा ही हूँ,मगर आपको पहचान नहीं पा रही।"
"शाली नाटक मत कर वर्ना तेरे घर आकर इतना चोदूँगा कि नानी याद आ जाएगी"
मैं तो इतना सुन के पानी पानी हो गई। फिर भी हिम्मत कर बोली,"सच कह रही हूँ, आपकी आवाज चेँज है सो नहीं पहचान पा रही हूँ।" मैं उसका नाम जानने की कोशिश कर रही थी।
"हाँ रात में कुछ ज्यादा ही शराब पी लिया था तो आवाज थोड़ी भारी हो गई।"
अब मेरी तीर निशाने पर लग रही थी। मैंने थोड़ी रिक्वेस्ट करते हुए बोली,"हाँ तभी तो नहीं पहचान रही हूँ कि कौन बोल रहे हैं।"
"शाली लण्ड तो अँधेरे में भी पहचान लेती है और लपक के चुसने लगती है। आवाज क्यूँ नहीं पहचान रही है।"
मैं तो ऐसी बातें सुन के शर्म के मरी जा रही थी मगर कुछ कुछ मजे भी आने लगी थी। हल्की मुस्कान आ गई मेरे चेहरे पर।

"प्लीज बता दीजिए ना!"
"बता दूँगा मगर मेरी एक शर्त है। वो माननी पड़ेगी तुम्हें"
"कैसी शर्त?"
"कल शाम में मैं घर आ रहा हूँ तो तुम अपने दोस्त पिँकी के साथ मेरा लण्ड लेने के लिए तैयार रहेगी।"
मेरी तो हलक सूख गई।ये पूजा और पिँकी क्या क्या गुल खिलाती है। मुझे तो गुस्सा भी आ रही थी। मगर मैं नाम जानना चाहती थी और थोड़ी थोड़ी मजे भी आ रही थी।मैं ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती थी,
"मैं तो तैयार हूँ मगर पिँकी से पूछ के कहूँगी।"
"तो ठीक है उस रण्डी से जल्दी पूछ के बताना।"
"अब तो नाम बता दीजिए।"
"शाली चूत मरवाने के लिए हाँ कैसे कह दी बिना पहचाने। एक नम्बर की रण्डी हो गई है।"
मुझे भी हँसी आ गई इस बात पर।क्यों नहीं आती आखिर वो सही ही तो कह रहे थे। हँसते हुए मैंने पुनः रिक्वेस्ट की नाम बताने की।
फिर उन्होंने अपना नाम बताया। नाम सुनते ही मैं तो बेहोश होते होते बची।मैं तो पूजा को मन ही मन गाली देना शुरू कर दी थी। शाली पूरे गाँव में और कोई नहीं मिला अपनी चूत मरवाने के लिए। मैंने फोन काट दी। मगर फोन फिर से बजने लगी। मैं उठा नहीं रही थी। फोन लगातार आ रही थी। मैं बाहर पूजा को देखी तो अभी भी पूजा कहीं नहीं दिखाई दे रही थी। कुछ देर बाद मैंने पुनः फोन रिसीव की।

"क्यों रण्डी, फोन क्यों काट दी?"
फोन उठाते ही नागेश्वर अंकल की तेज आवाज मेरी कानों में गूँज पड़ी।
नागेश्वर अंकल जो कि हमारे ससुर जी के चचेरे भाई हैं। उनकी उम्र करीब 45 है। वे 3 पंचवर्षीय से इस गाँव के मुखिया हैं। अब सुन रही हूँ कि वे विधायक का चुनाव लड़ेँगे। उनको मैं सिर्फ एक बार ही देखी हूँ। ऊँचा कद, गठीला बदन,लम्बी मूँछेँ,गले में सोने की मोटी चैन,हाथ की सारी उँगली में अँगूठी। जब मैं पहली बार देखी तो डर ही गई थी।
उनके साथ 12वीं की पूजा। ओफ्फ! मैं तो हैरान थी कि भला पूजा कैसे सह पाती होगी इनको।तभी मेरे कानों में पुनः जोर की "हैलो" गूँजी।
"हाँ अंकल सुन रही हूँ" हड़बड़ाती हुई बोली।
"चुप क्यों हो गई?"
"वो मम्मी आ गई थी ना इसलिए" अब मैं पूरी तरह पूजा बन के बात करने लगी।
"वो शाली बहुत डिस्टर्ब करती है हमें। एक बार तुम हाँ कहो तो उसको भी चोद चोद के शामिल कर लें। फिर तो मजे ही मजे।"
ओह गॉड ! मुझ पर तो लगातार प्रहार होती जा रही थी।मम्मी के बारे में इतनी गंदी.....।मैं संभलती हुई बोली," प्लीज मम्मी के बारे में कुछ मत कहिए।"
"अच्छा ठीक है नहीं कहूँगा।"
फिर उन्होंने पूछा,"अच्छा वो तेरी नई भाभी की क्या नाम है ?"
मैं अपने बारे में सुन के तो सन्न रह गई।मेरे हाथ पाँव कांप गई। फिर किसी तरह अपना नाम बताई।
"हाँ याद आया सीता। शाली क्या माल लगती है।गोरी चमड़ी,रस से भरी होंठ, गोल व सख्त चुची,चूतड़ निकली हुई,काले और लम्बे बाल, ओफ्फ शाली को देख के मेरा लण्ड पानी छोड़ने लगता है।"
मैं अपने बारे में ऐसी बातें सुन के पसीने छूट रहे थे।मुँह से आवाजें निकलनी बंद ही हो गई थी। बस सुनती रही।
"पूजा, प्लीज एक बार तुम सीता को मेरे लण्ड के नीचे ला दो। मैं तुम्हें रुपयों से तौल दूँगा।श्याम तो उसकी सिर्फ सील तोड़ा होगा, असली चुदाई के मजे तो उसे मेरे लण्ड से ही आएगी। जब उसकी कसी चूत में तड़ातड़ लण्ड पेलूँगा तो वो भूल जाएगी श्याम को। जन्नत की सैर करवा दूँगा। बोलो पूजा मेरे लण्ड के इतना नहीं करोगी?"
मैं तो अब तक पसीने से भीँग गई थी।क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आ रही थी। कुछ देर तो मूक बनी रही, फिर जल्दी से बोली," ठीक है, मैं कोशिश करूँगी। मम्मी आ रही है शायद मैं रखती हूँ, बाद में बात करूँगी।"
सिर्फ इतनी बातें ही बोल पाई और जल्दी से फोन काट दी। मेरी साँसे काफी तेज हो गई थी मानो दौड़ के आ रही हूँ।मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रही थी। अचानक मुझे चूत के पास कुछ गीली सी महसूस हुई। मैंने हाथ लगा कर देखी तो उफ्फ ! मेरी चूत तो पूरी तरह भीँगी हुई थी।
हे भगवान! ये क्या हो गया?
अंकल की बातें सुन के मैं गीली हो गई। मैं भी कितनी पागल थी जो आराम से सुन रही थी। एक बात तो थी कि अंकल की बातें अच्छी लग रही थी तभी तो सुन रही थी। पूजा की बातें तक तो नॉर्मल थी पर जब अपनी बातें सुनी तो पता नहीं क्या हो गया हमें। एक अलग सी नशा आ गई मुझमें। मैं मदहोश हो कर सुन रही थी और नीचे मेरी चूत फव्वारे छोड़ रही थी। इतनी मदहोश तो रात में चुदाई के वक्त भी नहीं हुई थी।
पूजा तो जानती होगी कि अंकल मुझे चोदना चाहते हैं। जानती होगी तभी तो वो हमसे दोस्ती की वर्ना आज के जमाने में ननद-भाभी में कहीं दोस्ती होती है।अगर होती भी होगी तो इतनी जल्दी नहीं होती।
अगर पूजा इस बारे में कभी बात की तो क्या कहूँगी? ना.. ना.. मैं ये सब नहीं करूँगी। मेरी शादी हो चुकी है, अब तो श्याम को छोड़ किसी के बारे में सोच भी नहीं सकती।
मैं यही सब सोच रही थी कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई। सामने पूजा आ रही थी।मैं तो एकटक देखती ही रह गई। कितनी मासूम लग रही है दिखने में, मगर काम तो ऐसा करती है जिसमें बड़ी बड़ी को मात दे दे। ऊपर से नीचे गौर से देखने लगी पूजा को। मैं तो कल्पना भी नहीं कर पाती थी कि इतनी प्यारी और छोटी लड़की भला एक 45 साल के मर्द को चढ़ा सकती है अपने ऊपर।
"क्या हुआ सीता डॉर्लिँग, किस सोच में डूबी हुई हैं।डरिए मत, मैं अपनी मेहनताना लिए बिना छोड़ूँगी नहीं।" कहते हुए खिलखिलाकर हँस पड़ी। मैं भी हल्की मुस्कान के साथ उसका साथ दी।
"आती हूँ नाश्ता बना कर फिर लूँगी।" पूजा अपना उठा के जाने के लिए मुड़ी।
"पूजा, तुम्हारी फोन!"
इतनी बातें सुनते ही पूजा के चेहरे की रंग मानो उड़ सी गई हो। वो जल्दी से आई और फोन मेरे हाथ से ले ली। फिर मेरी तरफ ऐसे देखने लगी मानो पूछ रही हो कि किसका फोन आया था।
मैं मुस्कुराती हुई बोली," तुम्हारी किसी सहेली का फोन था शायद। मैं बात करना नहीं चाहती थी,तुम्हें आवाज भी दी पर तब तक तुम बाहर निकल चुकी थी। कई बार रिंग हुई तो मैं बात कर ली।"
पूजा मेरी बात को सुनते हुए कॉल लॉग चेक करने लगी। नम्बर देखते ही वो पसीने से लथपथ सी हो गई। फिर मेरी तरफ देखने लगी।
उसकी आँखे गुस्से से लाल पीली हो रही थी, मगर बोली कुछ नहीं।
"कल शाम को तुम्हें और पिँकी से मिलना चाहते हैं।" मैं सीधी टॉपिक पर आ गई। इतना सुनते ही वो पैर पटकती हुई निकल गई। मुझे तो उसकी हालत देख कर हँसी भी आ रही थी। तुरंत में मेरे सर पे बैठने वाली लड़की पल भर में बिल्ली बन गई।वैसे मेरा इरादा उसके दिल पे ठोस पहुँचाने वाली नहीं थी। मैं तो उसे एक दोस्त की तरह सारी बातें जानना चाहती थी, फिर समझाना चाहती थी।
मैं पीछे से आवाज दी," पूजा, मेरी बात तो सुनो।"
मगर वो तो चलती चली गई अपने रूम की तरफ और अंदर जा कर लॉक कर ली।
अब मैं क्या करूँ? बेचारी नाराज हो गई हमसे।
बेकार ही फोन रिसीव की थी।
कम से कम नाश्ता तो करवा देती।
खैर; मैं बात को ज्यादा बढ़ाना ठीक नहीं समझी।
फिर रात का खाना श्याम के साथ खाकर सोने चली गई। पूजा सरदर्द का बहाना बना कर खाने से मना कर दी।

रात में श्याम ने दो बार जम के चोदा, फिर सो गए। दर्द तो ज्यादा नहीं हुई पर थक ज्यादा गई तो सुबह नींद देर से खुली। जल्दी से फ्रेश हुई और किचन की तरफ चल दी। सोची शायद पूजा होगी तो मनाने की कोशिश करूँगी।
मगर वहाँ मम्मी जी और पूजा दोनों साथ खाना बना रही थी। मैं भी खाना बनाने में हाथ बँटाने लगी। इस दौरान पूजा मेरी तरफ एक बार भी पलट के देखी भी नहीं।
मैंने भी ज्यादा कोशिश नहीं की वहाँ बात करने की। किचन का काम खत्म कर मैं अपने रूम में आ गई। तब तक श्याम भी फ्रेश हो गए थे। वे खाना खा कर निकल गए।
11 बजे तक सब खाना खा चुके थे।मम्मी जी आराम करने अपने रूम में चले गए। मैं अब पूजा से बात करने की सोच रही थी। मैं उठी और पूजा की रूम की तरफ चल दी।
मम्मी,पापा,श्याम और मैं नीचे रहते थे जबकि पूजा ऊपर बने कमरे में रहती थी। सीढ़ी चढती हुई मैं रूम तक पहुँची और दरवाजा खटखटाया।
" कौन? " अंदर से पूजा की आवाज आई।
" पूजा मैं। दरवाजा खोलो।"
कुछ देर बाद लॉक खुली तो मैं गेट को हल्की धक्के देती हुई अंदर आई और गेट पुनः बंद कर दी।
अंदर की नजारा देखी तो मुझे एक झटका सा लगा। रूम की सजावट और हर एक चीज एकदम नई और लेटेस्ट थी। मैं क्या कोई भी सोच नहीं सकता था कि गाँव में ऐसी बेडरूम हो सकती है।पूरे कमरे में टाइल्स लगी थी जिसपे एक कालीन बिछी थी। नई L.E.D. दीवार पर टंगी थी। रूम में फ्रिज, water-purifier,A.C.,Fan,etc. सब एक दम नई लगी थी। काँच की टेबल पर एकदम लेटेस्ट Nightlamp रखी थी। बेड देख के तो दंग रह गई। आज तक ऐसी बेड तो मैं छुई भी नहीं थी।
मैं तो मानो स्वर्ग में आ गई थी रूम में फैलाइ गई स्प्रे से। मैं अब तक तो भूल गई थी कि यहाँ क्यों आई हूँ।
अचानक L.E.D. से आवाज आने लगी जिससे मेरी होश टूटी। देखी तो पूजा बेड पर बैठी कोई धारावाहिक चालू कर दी। मेरी तरफ तो देख भी नहीं रही थी। मैं चुपचाप उसके पास जा कर बेड पर बैठ गई।
कुछ देर तक देखी कि पूजा कुछ पूछेगी कि क्या बात है या क्यों आई हो यहाँ? मगर वो कुछ नहीं बोल रही थी।अंत में मैं ही बोली।
" पूजा । हमसे बात नहीं करोगी? "
मैं पूजा के जवाब की इंतजार करने लगी मगर पूजा तो मानो कुछ सुनी ही ना हो।
" मैं तो एक दोस्त की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ, जो ना केवल अच्छी बातें ही बताए बल्कि हर एक चीज सुने और सुनाए।
मैं तो वैसी दोस्त चाहती हूँ जो अगर मेरे बारे में कुछ सुने या जाने तो पहले हमसे पूछे, ना कि बिना कुछ जाने समझे नाराज हो जाएँ।
पता है आज तक मुझे वैसी दोस्त कभी मिली ही नहीं, जिस कारण मैं अभी तक बिना दोस्त की हूँ।
कल जब मैं तुमसे पहली बार मिली तो ऐसा लगा, मुझे जिसकी तलाश थी वो अब पूरी हो गई। "
मैं लगातार बोले जा रही थी । मगर पूजा ज्यों की त्यो सिर्फ सुन रही थी।
" कल जो कुछ भी हुआ उसकी जिम्मेदार मैं ही हूँ। मुझे बिना पूछे फोन रिसीव नहीं करनी थी। मैं तो ये सोच के रिसीव की थी कि दोस्त की ही तो फोन है, रिसीव कर भी ली तो कुछ करेगी थोड़े ही।आएगी तो कह दूंगी। मगर मैं गलत थी। अगर पता होता कि मेरी वजह से किसी को ठेस पहुँचती है तो कतई मैं ऐसा नहीं करती।
पूजा , कल की गलती के लिए मैं काफी शर्मिँदा हूँ सो प्लीज मुझे माफ कर देना। मैं वादा करती हूँ कि ऐसी गलती कभी नहीं करूँगी। बस एक मौका दे दो क्योंकि मैं एक अच्छी दोस्त खोना नहीं चाहती। और कल वाली बात भी मैं सदा के लिए भूला दी हूँ। सो प्लीज......"
कहते कहते पता नहीं मुझे क्या हो गया। मैं रूआंसी सी हो गई थी, मेरी आवाजें अब कांप रही थी।ऐसा लग रहा था मानो अंदर ही अंदर रो रही हूँ। अब मुझे लग रहा था कि मैं यूँ ही पूजा के पास नहीं आई हूँ। वो 1 दिन में ही मेरे दिल तक पहुँच गई थी। भले ही वो कितनी ही गंदी काम क्यों ना करती हो। गंदी क्या करती है? वो तो शायद अपने दिल की सुनती है,दिल से कहती है। अब दिल ऐसा कर दिया करने को तो कर दी। वैसे दिल से कोई भी किया काम कभी गंदा नहीं होता।
मैंने पूजा की तरफ देखी कि शायद कुछ बोलेगी मगर वो तो गालोँ पर हाथ रखी टी.वी. देखने मैं मग्न थी। कुछ देर इंतजार करने के बाद मैं उठी और बोली, "पूजा, मैं नीचे जा रही हूँ। अगर माफ नहीं करोगी तो कोई बात नहीं।पर दोस्त से नहीं तो कम से कम भाभी से बात कर लेना। मेरे नसीब में दोस्त नहीं लिखी होगी तो कहाँ से मिलेगी?" इतना कह मैं वहाँ से चल दी।
गेट खोल कर ज्यों ही बाहर निकलने की कोशिश की तभी पूजा पीछे से दौड़ के आई और जोर से लिपट के रोने लगी। मैं तो चौंक गई कि क्या हो गया इसे।
मैं उसके हाथ को थोड़ी ही ढीली करते हुए मुड़ी और उसे गले से लगा ली। वो लगातार रोये जा रही थी। उसके बालों को सहलाते हुए पूछी, " ऐ पूजा, क्या हुआ? रो क्यों रही हो?"
मगर वो तो रोये ही जा रही थी।
कुछ देर तक यूँ ही उसकी बालों को सहलाती रही।
" पहले चुप हो जाओ प्लीज, वर्ना मैं भी रो दूंगी।" अब पूजा कुछ शांत हुई मगर अभी भी सुबक रही थी।
" बात क्या है ? तुम रो क्यों रही हो!मेरी बातों से रो रही हो या फिर कोई और बात है?" मैंने प्यार से पूछने की कोशिश की।
" सॉरी भाभी, मैं आपको गलत समझ रही थी। मुझे लगा कहीं आप किसी को कह देंगे तो मैं तो मर ही जाती।" इतना कह फिर से वो सुबकने लगी।
" इतनी पागल लगती हूँ क्या? मैं तो वही जानने चाहती थी कि तुम क्या कहती हो इस बारे में। दोस्त का काम संभालना होता है, ना कि परेशानी में डालना। चलो पहले रोना बंद करो फिर बात करते हैं। "
पूजा को लेकर मैं वापस बेड की तरफ आई और साथ लेकर बैठ गई। कुछ देर में वो चुप हो गई। फिर उठी और बाथरूम में जाकर हाथ मुँह धो फ्रेश होकर आई और मेरे पास आकर बैठ गई।
मुझे पता क्या सूझी। उससे सट के एक हाथ उसकी बगलेँ में ले जाकर जोर से गुदगुदा दी। पूजा ना चाहते हुए भी हँस के उछल पड़ी। मैं भी हँसते हुए बोली, " देखो हँसते हुए कितनी प्यारी लगती हो। कल शाम से ऐसे मुँह फुलाए थी कि जैसे किसी ने किडनी निकाल लिया हो।"

अब मैं पूजा से थोड़ा खुलना चाहती थी और पूजा को भी बेहिचक बुलवाना चाहती थी। मैंने पूजा को बाँहों में भरते हुए बेड पर पसर गई और पूछी," क्यों पूजा रानी? जरा हमें भी तो बताओ कि नागेश्वर अंकल में ऐसी क्या बात है जो दीवानी हो गई।"
पूजा मेरे नीचे दबी मुस्कुरा रही थी। उसकी चुची मेरी चुची से दब रही थी, और मेरी होंठ लगभग सट रही थी। हम दोनों की साँसें आपस में टकरा रही थी।
पूजा जब कुछ देर तक नहीं बोली तो मैंने अपनी नाक उसके होंठ पर रगड़ते हुए बोली,"पूजा, अंकल से मिलने कब और कहाँ जाएगी ये तो बता दो।"
"मैं नहीं जाने वाली भाभी।"पूजा मुस्कुराती हुई बोली।
"क्यों ?" मुझे थोड़ी अजीब लगी सुनकर।
"मैं थोड़े ही हाँ बोली हूँ जो जाउँगी। तुम बोली हो तो जाओ तुम" बोलते हुए पूजा जोर से हँस दी।
हमें भी हँसी आ गई। मैंने पूजा की गोरी गालोँ को दाँतो से दबाते हुए बोली,"साली, शर्म नहीं आती भाभी को ऐसे बोलते। खुद तो फँसेगी ही हमें भी फँसाओगी। और वैसे भी जब घर में मिल जाए तो बाहर जाने की क्या जरूरत?"
"भाभी, अंकल वैसे आदमी नहीं हैं जो बदनाम कर दे। वो पूरी तरह सुरक्षित हैं।"
"रहने दे। मैं यहीं काफी खुश हूँ। और हाँ अंकल को बोल देना कि वो मुझ पर से अपना ध्यान हटा लें क्योंकि मैं कभी नहीं ये सब करने वाली।"
पूजा मेरी बात सुनकर खिलखिलाकर हँस पड़ी।
"मेरी सीता डॉर्लिंग है ही इतनी खूबसूरत कि अंकल क्या कोई भी मचल जाए एक दीदार को।"
मैं पूजा की ऐसी रोमांचित बातें सुन आपा खो दी और अपने होंठ पूजा की होंठ से सटा दी। पूजा भी बिना किसी हिचक के साथ देने लगी।
कुछ ही देर में पूजा पूरी तरह से गर्म हो कर जोर से चूसने लगी।मेरी साँसे भी तेजी से चलने लगी थी पर पीछे नहीं हटना चाहती थी।
अगले ही पल पूजा अपनी बाहोँ में मुझे कसते हुए पलटी। अब मैं पूजा के नीचे दबी थी। हाथ को उसने मेरी गर्दन के नीचे रखी थी जिससे मैं चाह कर भी होंठ नहीं हटा सकती थी। अचानक एक हाथ खींच कर मेरी चुची पर रख दी।मैं चौंक गई और तेजी से अपने हाथ से उसकी हाथ पकड़ी। पर हटा नहीं पाई क्योंकि मुझे भी अच्छा लग रहा था।
पूजा अब चूसने को साथ साथ मेरी चुची भी दबाने लगी। मैं तो आनंद को सागर मैं गोते लगा रही थी। 2 दिन में तो मेरी जिंदगी बदल गई थी।
अचानक पूजा होंठ को छोड़ दी और नीचे आ कर एक चुची को मुँह में कैद कर ली।मेरी तो आह निकल गई। ब्लॉउज के ऊपर से ही मेरी चुची की चुसाई और घिसाई जारी थी। मैं तो स्वर्ग मैं उड़ रही थी।कुछ देर बाद पूजा अपना मुँह मेरी चुची से हटाते हुए बोली,"भाभी आपको यकीन नहीं होगी कि आज मैं कितनी खुश हूँ। सच भाभी आप काफी अच्छी हो।"
मैंने पूजा को ऊपर खिंची और उसकी होंठों को चूमते हुए बोली," खुश तो मैं भी हूँ कि मुझे इतनी अच्छी दोस्त और प्यारी ननद मिली है।चल अब तो बता कि सारे लड़के मर गए थे क्या जो तूने अंकल से दोस्ती कर ली।"
"नहीं भाभी, कॉलेज में एक बॉय फ्रेंड भी है पर उसके साथ सिर्फ बात करती हूँ। पता है, जब सिर्फ बात करती हूँ तो सारा कॉलेज जान गया। अगर उसके साथ सेक्स की तो पता नहीं कौन-कौन जान जाएगा।"
"ऐसी बात है तो उसे छोड़ क्यों नहीं देती?"
"नहीं भाभी,अगर ब्रेकअप कर लूँगी तो रोज 10 लड़के मेरे पीछे पड़े रहेंगे। अभी तो कम से कम आराम से कॉलेज आ जा तो रही हूँ ना।जब तक कॉलेज है बात करूँगी, बाद में अलग हो जाऊंगी।"
"हम्म। दिमाग तो बहुत चलती है,पर ऐसा करना तो धोखा देना है।" कुछ हद तक तो सही ही कह रही थी।
"नहीं नहीं! मैं पहले ही बोल चुकी हूँ कि नो शादी, नो सेक्स।"
पूजा हंसती हुई कहने लगी," वो भी मेरे टाइप का ही है। उसे जब भी मन होती है तो सेक्स करने वाली को ले के चला जाता है।"
"चल ठीक है।कुछ भी करना पर बदनामी वाली कोई हरकत मत करना।"
"नहीं भाभी, मैं ऐसी वैसी कोई काम नहीं करती।"
"अच्छा,सच बता तो अंकल को चांस कैसे दे दी अपनी इस आम को चुसवाने के लिए?"मैं नीचे दबी ही पूजा की चुची को मसलते हुए बोली।
"वो सब जाने दो । बस इतना जान लो कि नागेश्वर अंकल काफी अच्छे हैं।मैं उन्हें बचपन से ही काफी पसंद करती थी। जब कॉलेज जाने लगी तो देखी अंकल की नजरें भी कॉलेज के लड़कों जैसी ही मुझे निहारती थी। तो मैं भी हिम्मत कर के आगे बढ़ने लगी और एक दिन ऐसा हुआ कि मैं उनकी पूरी तरह दीवानी हो गई। "
पूजा अब मेरे सीने से लग के बोली जा रही थी और मैं उसकी पीठ सहला रही थी।
"पूजा। एक बात और बता, अंकल जब चढ़ते होंगे तो कैसे संभाल पाती होगी तुम।" कहते हुए मैं हँस दी।
पूजा भी हंसती हुई बोली,"एक बार तुम भी चढवा लो अंकल को फिर देखना कैसी संभालती हूँ।"
"ना ना मुझे नहीं देखनी। मुफ्त में मारी जाउँगी।"
"भाभी, अंकल आपके कितने से दीवाने हैं ये तो सुन ही चुकी हो अंकल से। बस तुम हाँ कह दोगी तो फिर तुम भी दीवानी हो जाओगी।और उनसे बातें करना तो आपको पसंद भी है "
मैं तो सोच में पड़ गई कि क्या पूजा अंकल को बता दी कि उस समय मैं बात कर रही थी। मेरे तो पसीने निकलने लगी थी।मुझे सोच मे देख पूजा कान में धीरे से बोली,"ओह भाभी, टेँशन क्यों लेती हो। मेरी फोन में ऑटो रिकॉर्डिंग होती है। उसी में सुनी हूँ। अंकल से अभी तक बात नहीं की हूँ।अगर आप कहोगी तो कर लूँगी वर्ना जाने दो। अब आप हो तो अंकल की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।"
पूजा की बातें सुन ढेर सारा प्यार जग गई मेरे अंदर। खुद को संभालती हुई बोली,"बात कर लेना अंकल से।और प्लीज मेरा नाम मत लेना। अब मम्मी जी आएगी तो मैं नीचे जा रही हूँ"
"भाभी, एक बार अंकल से बात तो कर लो फिर चली जाना।"पूजा हंसती हुई मेरे शरीर से उठती हुई बोली।
मैं भी हँस के बोल पड़ी,"पहले तुम कर लो फिर बाद में मैं कर लूँगी।"
मैं उठी और कपड़े ठीक कर के जाने लगी।
तभी नीचे से मम्मी जी की आवाज सुनाई दी।पीछे से पूजा बोली,"और कुछ करने की इच्छा हुई तो बेहिचक दोस्त की तरह बताना।"
मैं बिना कुछ बोले मुस्कुराती हुई नीचे आ गई।

शाम के 4 बजे चुके थे। श्याम आए तो उन्हें नाश्ता दी। वे रूम में बैठ कर नाश्ता कर रहे थे। मम्मी जी नाश्ता करके पड़ोस वाली आंटी के यहाँ बैठी गप्पे लड़ा रही थी।
तभी बाहर से किसी के बोलने की आवाज आई। वो श्याम को बुला रहा था।
श्याम उनकी आवाज पहचान गए थे।
"हाँ अंकल, अंदर आइए ना। पटना से कब आए?" श्याम मुँह का निवाला जल्दी से अंदर करते हुए बोले।
इतना सुनते ही मेरी तो रूह कांप उठी। मैं अनुमान लगा ली कि शायद नागेश्वर अंकल आए हैं। तब तक अंकल अंदर आ गए। चूँकि मैं रूम में ही थी तो देख नहीं पाई परंतु उनके पदचाप सुन के मालूम पड़ गई थी।
"क्या बेटा? हर वक्त घर में ही घुसे रहते हो। मैं तो तुम्हारी शादी कर के पछता रहा हूँ। मैं यहाँ आँगन तक आ गया हूँ और तुम हो कि अभी भी घर में ही हो।"
हम दोनों की हँसी निकल पड़ी। श्याम हँसते हुए बोले," नहीं अंकल, अभी अभी आया हूँ बाहर से। भूख लग गई थी तो नाश्ता कर रहा हूँ। आप बैठिए ना तुरंत आ रहा हूँ मैं।"
"हाँ हाँ बेटा, अब तो ऐसी ही 5 मिनट पर भूख लगेगी। चलो कोई बात नहीं मैं बैठता हूँ।" अंकल भी हँसते हुए बोले और वहीं पड़ी कुर्सी खींच कर बैठ गए।
मेरी तो हँसी के मारे बुरी हालत हो रही थी। किसी तरह अपनी हँसी रोक कर रखी थी।
"पूजा और मम्मी कहाँ गई है? दिखाई नहीं दे रही है।" अंकल कुछ देर बैठने के बाद पुनः पूछे।
"अंकल मम्मी अभी तुरंत ही आंटी के यहाँ गई है और पूजा अपने कमरे में होगी टीवी देख रही।" श्याम बोले
"क्या? जाएगी कम्पीटिशन की तैयारी करने और अभी से दिन भर टीवी से चिपकी रहती है।" अंकल आश्चर्य और नाराजगी से मिश्रित आवाज में बोले और पूजा को आवाज देकर बुलाने लगे। पर पूजा शायद सो रही थी जिस वजह से वो कोई जवाब नहीं दी।
तभी श्याम बोले," रूकिए अंकल, मैं बुलवा देता हूँ।" और श्याम हमें पूजा को बुलाने कह दिए। मैं तो डर और शर्म से पसीने पसीने होने लगी, पर क्या करती?
मैंने साड़ी से अच्छी तरह शरीर को ढँक ली और लम्बी साँस खींचते हुए जाने के आगे बढ़ी। क्योंकि पूजा के रूम तक जाने के लिए जिस तरफ से जाती उसी ओर अंकल बैठे थे।
मैं रूम से निकलते ही तेजी से जाने की सोच रही थी पर मेरे कदम बढ़ ही नहीं रही थी। ज्यों ज्यों अंकल निकट आ रहे थे त्यों त्यों मेरी जान लगभग जवाब दे रही थी।
अंकल के निकट पहुँचते ही मेरी नजर खुद-ब-खुद उनकी तरफ घूम गई। चूँकि मैं घूँघट कर रखी थी जिस से उनके चेहरे नहीं देख पाई और ना ही वे देख पाए। देखी तो सिर्फ उनके पेट तक के हिस्से।
क्षण भर में ही मेरी नजर उनके पेट से होते हुए नीचे बढ़ गई और उनके लण्ड के उभारोँ तक जा पहुँची। मैं तो देख कर सन्न रह गई।
अंकल एक सभ्य नेता की तरह कुरता-पाजामा पहने थे तो उनका लण्ड लगभग पूरी तरह तनी हुई ठुमके लगा रही थी, एकदम साफ साफ दिख रही थी।
मैंने तुरंत नजर सीधी की और तेजी से आगे बढ़ गई। लगभग दौड़ते हुए पूजा के कमरे तक जा पहुँची।
कुछ क्षण यूँ ही रुकी रही फिर गेट खटखटाई। एक दो बार खटखटाने के बाद अंदर से पूजा बोली," आ रही हूँ।"
मैं गेट खुलने का इंतजार कर रही थी कि फिर से मेरी नजर नीचे बैठे अंकल की तरफ घूम गई।
ओह गोड! ये क्या। अंकल अभी भी मेरी तरफ देख रहे थे और अब तो उनका एक हाथ लण्ड पर था। मैं जल्दी से नजर घुमा ली कि तभी गेट खुली। मैं सट से अंदर घुस गई और बेड पर धम्म से बैठ के हांफने लगी। पूजा मेरी तरफ आश्चर्य से देख रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रही थी कि क्या हुआ।
"क्या हुआ भाभी?" पूजा जल्दी से मेरे पास आकर बैठ गई और आश्चर्य मुद्रा में पूछी।
मैंने अपनी साँसें को काबू में करते हुए सारी बातें एक ही सुर में कह डाली।
पूजा मेरी बातें सुनते ही जोर से हँस पड़ी।मेरी भी हल्की हँसी छूट पड़ी। तभी नीचे से एक बार फिर अंकल की आवाज आई।
"पूजा बेटा, जल्दी नीचे आओ मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"
"बस आ रही हूँ अंकल 1 मिनट में।" पूजा भी लगभग चिल्लाते हुए जवाब दी।
"चलो भाभी, अंकल से मिलते हैं।" पूजा मेरी तरफ देखते हुए बोली।
"नहीं.नहीं. मैं यहीं रुकती हूँ। तुम मिल कर आओ।"मैंने तपाक से जवाब दी।
"चलती हो या बुलाऊँ यहीं अंकल को।" धमकी देते हुए पूजा बोली।
मैं सकपका कर तुरंत ही चलने की हामी भर दी। मैं और पूजा नीचे उतरी। पूजा अंकल के पास बैठ गई पर मैं तो एक्सप्रेस गाड़ी की तरह रूम में घुस गई। पीछे से दोनों की हँसी आ रही थी, जिसे सुन मैं भी हँस पड़ी। श्याम अब तक नाश्ता कर बाहर जाने के लिए खड़े हाथ मुँह पोँछ रहे थे। फिर वे भी बातों को ताड़ते हुए हँस पड़े और निकल गए।
श्याम बाहर जाकर अंकल से दो टुक बात किए और जरूरी काम कह के निकल गए।
अब तो दोनों पूरी तरह फ्री थे। दोनों बात करने लगे, मैं सुनना चाहती थी मगर उनकी आवाज इतनी धीमी थी कि कुछ सुनाई नहीं दे रही थी।
मैं तो अब और व्याकुल हो रही थी सुनने के लिए। लेकिन क्या कर सकती थी।
कोई 10-15 मिनट बात करने के बाद पूजा मेरे कमरे में आई और बोली," भाभी, बाहर चलो। अंकल बुला रहे हैं।"
मेरी तो पूजा की बात सुनते ही दिमाग सुन्न हो गई।
"किस लिए?"फिर भी हकलाते हुए पूछी।
मेरी हालत देख पूजा हँस दी।
"चलो तो, मुझे थोड़े ही पता है किस लिए बुला रहे हैं। वे बोले बुलाने के लिए तो आई हूँ"
"नहीं पहले बताओ क्यों बुला रहे हैं तो जाऊंगी।"
"तुम तो बेकार की परेशान हो रही हो भाभी। कल वाली बात अंकल को नहीं पता है। कोई और काम है इसलिए बुला रहे हैं।" पूजा मुझे मनाते हुए बोली।
"फिर क्या बात है?तुम तो जानती होगी।" मैं अब थोड़ी नॉर्मल होते हुए पूछी।
पूजा दाँत पीसती हुई मेरी चुची पकड़ के मसलते हुए बोली,"तुम्हारी चूत फाड़ने के लिए बुला रहे हैं।"
मैं दर्द से कुलबुला गई। किसी तरह मेरी चीख निकलते निकलते बची।
मैं थोड़ी नाराज सी होते हुए बोली,"जाओ मैं नहीं जाती।"
पूजा को भी मेरी तकलीफ महसूस हुई तो मेरी गालोँ पर किस करते हुए बोली," भाभी प्लीज, कोई भी गलत बात नहीं होगी। वे आपसे मिलना चाहते हैं इसलिए बुला रहे हैं। चलो ना अब।"

कुछ देर तक मैं सोचती रही कि क्या करूँ? पता नहीं क्यों बुला रहे हैं? पूजा लगातार प्लीज प्लीज करती रही। अंतत: मैंने चलने की हामी भर दी।
मैंने अच्छी तरह से घूँघट की और पूजा के बाहर निकल गई।मैं तो अभी तक अंदर ही अंदर डर रही थी। कहीं कल वाली बात अगर जान गए होंगे तो पता नहीं क्या होगी! यही सब सोचते मैं पूजा के पीछे पीछे चल रही थी।
अंकल के पास पहुँचते ही उनके पैर छू कर प्रणाम की और पूजा के पीछे खड़ी हो गई।अंकल के दाएँ तरफ हम दोनों खड़ी थी। मेरी तो दिल अब काफी तेजी से चल रही थी कि पता नहीं अब अंकल क्या पूछेँगे?
तभी पूजा अंकल के सामने लगी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। अंकल के बाएँ और पूजा के दाएँ तरफ एक और कुर्सी लगी थी। शायद अंकल पहले ही पूजा द्वारा मंगवा लिए थे।
पूजा और अंकल पहले से ही तय कर लिए थे शायद कि मुझे बीच में बैठाएंगेँ।
मैं अकेली खड़ी रही, अंदर से तो शर्म से पानी पानी हो रही थी।
"पूजा, मैं तो अपनी बेटी से मिलने आया था और तुम किसे ले आई हो।"तभी अंकल पूजा से हँसते हुए पूछे। पूजा अंकल की बातें सुन जोर से हँस पड़ी,पर बोली कुछ नहीं।
"सीता बेटा, बुरा मत मानना, मैं मजाक कर रहा था। आओ पहले बैठो फिर बात करते हैं।"
कहते हुए अंकल उठे और मेरी दोनों बाजू पकड़ के कुर्सी के पास ले जाकर बैठने के लिए हल्की दबाव दिए।
मैं तो हक्की-बक्की रह गई। शरीर से तो मानो जान निकल गई थी और अगले ही क्षण कुर्सी पर बैठी थी। अंकल के छूने से मेरी एक एक रूह कांप गई थी। तभी अंकल बोले,"देखो बेटा, हम लोग एक ही घर के हैं तो यहाँ पर्दा करने की कोई जरूरत नहीं है, करना होगा तो दुनिया वालों के लिए करना पर्दा।जैसे पूजा मेरी लाडली बेटी है वैसे ही तुम भी हो आज से। जब भी मेरी जरूरत पड़े तो बेहिचक कहना।" अंकल मेरी ओर थोड़े से झुक के बोले जा रहे थे।
मन ही मन सोच रही थी कि पूजा आपकी कितनी लाडली है ये तो मैं अच्छी तरह जान ही गई हूँ।
"अजीब बात है। मैं बोले जा रहा हूँ और तुम हो कि सारी बात सुनते हुए भी अभी तक घूँघट किए हो हमसे। औरों के लिए बहू होगी पर हम लोगो के लिए तो बेटी ही हो। सो प्लीज सीता...,"
तब तक पूजा उठ के मेरे पास आई और मेरी घूँघट उठाते हुए कंधे पर करते हुए बोली," क्या भाभी, अब तो शर्म छोड़ दो।"
फिर पूजा अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।
पूरा चेहरा पसीने से भीग के लथपथ हो गई थी। ऊपर नजर करने की बात तो दूर, हिलने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी मेरी।
तभी अंकल अपने जेब से रूमाल निकाल के देते हुए बोले," देखो तो, घूँघट रखने से कितना नुकसान होता है।इतनी खूबसूरत चेहरे पसीने से खराब हो रही थी सो अलग और तुम परेशान थी सो अलग। लो साफ कर लो पसीना।"
अंकल थे कि मुझे लगातार खुलने के लिए विवश कर रहे थे और एक मैं थी कि शर्म कम करना तो दूर और बढ़ा ही रही थी।
अब अगर अंकल की बात नहीं मानती तो वो मुझे यकीनन पुरानी ख्याल वाली लड़की समझ बैठते। सो थोड़ी हिम्मत कर के उनके हाथ से रूमाल ले ली और पसीने पोँछने लगी।चेहरा साफ करने के बाद अपना पल्लू माथे पर कर ली। अब घूँघट करने की बात तो सोच भी नहीं सकती थी।
"गुड बेटा, अब थोड़ी थोड़ी हमारी बेटी की तरह लग रही हो" कहते हुए अंकल हँस दिए। उधर पूजा सिर्फ हम दोनों की बातें सुन कर मुस्कुरा रही थी,बोल कुछ नहीं रही थी। पता नहीं पागल क्या सोच के चुप थी।कम से कम मेरे बदले तो कुछ बोलती।
मेरी भी डर अब भाग रही थी।
"क्या बातें हो रही देवर जी?"तभी पीछे से मम्मी जी आवाज सुनाई दी जो कि अंकल को देख कर पूछी थी।
मम्मी जी की तरफ सब घूम के देखने लगे।मैं उठ के खड़ी हो गई।
"अरे बेटी,तुम बैठो ना! पूजा कुर्सी ला दो। भाभी जी, बहू आ गई तो आप गायब ही रहती हैं। अब तो बच्चों के साथ ही गप्पे लड़ाना पड़ेगा।" अंकल मम्मी को ताना देते हुए बोले।
तब तक पूजा कुर्सी ला दी।मम्मी के बैठने के बाद मैं और पूजा भी बैठ गई।मम्मी जी के साथ साथ हम सब भी अंकल की बातें सुन हँस पड़ी।
"भाभी जी, मैं अपनी बेटी को फुर्सत के अभाव में मुँह देखाई नहीं दे पाया। बस इसी कारण आते ही यहाँ आया हूँ, वर्ना आप तो ताने देते देते मेरी जान ले लेते।"अंकल मुस्कुरा कर अपनी सफाई देते हुए बोले।
अब मेरी भी समझ में आ गई थी कि अंकल क्यों बुला रहे थे।
"ही ही ही. . आप अपनी बेटी को नहीं देते ऐसा कभी हो सकता है क्या? अगर ऐसा आप सोचते भी तो सच में आपकी जान ले लेती।" मम्मी जी भी हँसते हुए बोली।
सच कहूँ तो मैं सोची भी नहीं थी कि मेरे ससुराल में इतने अच्छे परिवार मिलेंगे। मेरे ससुर जी और अंकल दोनों भाई में अकेले ही थे, और चचेरे भाई में इतना लगाव आज पहली बार देखी।
तभी अंकल बाहर गए और कुछ ही देर में हाथ में एक बड़ा पैकेट लेते आए। वो शायद बाहर गेस्ट रूम में रखे थे। आते ही मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोले," लो बेटा, मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट। पसंद ना आए तो बता देना क्योंकि मैं अपनी मर्जी से लिया हूँ।"
मैं हल्की सी शर्माती हुई पैकेट ले ली।
मैं पूजा की तरफ नजर दौड़ाई तो वो मेरी तरफ देख कर अभी भी मुस्कुरा रही थी। मैं नजरें चुरा कर उसे चलने को कहा। वो भी बात को तुरंत समझ गई और उठती हुई बोली,"अंकल, आप लोग बात कीजिए मैं चाय लाती हूँ। चलो भाभी।"
इतना सुनते ही मैं जल्दी से खड़ी हुई और सीधे रूम की तरफ बढ़ गई। पूजा भी पीछे से हंसती हुई आई।
रूम में आते ही पूजा पीछे से लिपटती हुई बोली," भाभी, अभी मत खोलना पैकेट। मैं आती हूँ तो मैं भी देखूंगी सो प्लीज।"
मेरी हँसी निकल गई। मैं हँसते हुए बोली,"अच्छा ठीक है।"
फिर मेरी गालोँ पर किस कर पूजा चली गई। मैं भी पैकेट रख पूजा के आने तक बैठ के इंतजार करने लगी।

पैकेट में क्या हो सकती है, मैं खुद परेशान थी। पर मम्मी जी के सामने दिए थे तो कुछ राहत जरूर मिली कि कोई ऐसी-वैसी चीजें तो नहीं ही होगी। फिर भी मेरे अंदर एक अलग ही उत्सुकता थी जल्द से जल्द देखने की।
पर ये पूजा पता नहीं कहाँ मर गई थी। चाय बनाने गई या चूत मरवाने जो इतनी देर लगा रही है। किसी तरह अपने मन को शांत कर रही थी।
तभी पूजा धड़धड़ाती हुई अंदर आई और आते ही बोली," भाभी अब जल्दी से खोल के दिखाओ।"
उसकी बातों पर मुझे थोड़ी शरारत सूझी।
होंठों पर कुटील मुस्कान लाते हुई पूछी,"क्या खोल के दिखाऊँ?"
सुनते ही पूजा आँख दिखाते हुए बोली,"कमीनी, अभी तो पैकेट खोलो। और कुछ खोलने की इच्छा है तो अंकल को बुलाती हूँ, फिर खोलना।"कहते हुए पूजा जाने के लिए मुड़ी कि मैं जल्दी से उसे पकड़ी।
"पूजा की बच्ची,मार खाएगी अब तू। मैं तो यूँ ही मजाक कर रही थी और तुम तो सच मान गई। चल पैकेट खोलती हूँ।" अपनी बाँहों में कसते हुए बोली। पूजा मेरी बातें सुन मुस्कुरा दी और वापस आने के लिए मुड़ गई।
फिर हम दोनों बेड पर बैठ बीच में पैकेट रखी और उसकी सील हटाने लगी।
सील हटते ही पूजा उसमें रखी थैली उठा ली।
अंदर दो थैली थी,दूसरी थैली मैं उठा के खाली पैकेट को साइड में कर दी।
"भाभी, पहले ये वाली खोलो।"पूजा अपना पैकेट मुझे पकड़ाते हुए बोली।
मैं भी हंसती हुई पैकेट ले कर उसे खोलने लगी।
मैं जानती थी अगर पूजा को खोलने कहती तो वो कभी हाँ नहीं कहेगी। अब तक तो उसकी काफी चीज मैं जान गई थी। ऐसी लड़की कभी घमंडी या खुदगर्ज नहीं होती।
तभी तो मुझे पूजा इतनी अच्छी लगने लगी थी।
थैली खुलते ही लाल रंग के कपड़े नजर आई।
पूजा जल्दी से उठा के देखने के लिए बेड पर रख खोलने लगी।
पूरी तरह से खुलते ही हम दोनों की मुख से Wowwwww! निकल पड़ी।
बहुत ही खूबसूरत नेट वाली लहंगा साड़ी थी जो कि रेशम की थी।
Red और Maroon कलर की थी, जिस पर तिरछी डाली की तरह गोल्ड कलर की डिजाइन बनी हुई थी। जिसके ऊपर stones से काम की हुई थी, जो कि एक बिगुल की तरह लग रही थी। बॉर्डर पर काफी सुंदर Lace से काम किया हुआ था।
कढ़ाई भी बहुत अच्छी से की हुई थी। ठीक से देखने पर भी कोई त्रुटि नहीं मिलती।
मेरी हो आँखें फटी की फटी रह गई इतने महँगे साड़ी देख कर।
तभी पूजा के हाथों में ब्लॉउज देखी, जो कि देख के मंद मंद मुस्कान दे रही थी। मैं देखी तो एक बारगी शर्मा गई थी।
ब्लॉउज Off-Shoulder डिजाइन की थी, जिस पर नाम मात्र की हल्की Work की हुई थी। बहुत ही खूबसूरत लग रही थी।
मैं तो ये सोचने लगी कि ऐसी ब्लॉउज मैं गाँव में कैसे पहन सकती हूँ।
"भाभी, इस ड्रेस में पूरी कयामत लगेगी। जो भी देखेगा, देखता ही रह जाएगा।"पूजा हंसती हुई बोली।
मैं तो सोच के ही शर्मा गई।
"भाभी, जल्दी से एक बार पहन के दिखाओ ना। सच कहती हूँ काफी सुंदर लगोगी।"
"नहीं, मुझे नहीं पहननी।"
"प्लीज भाभी,सिर्फ एक बार।फिर जल्दी से खोल देना।"पूजा गिड़गिड़ाते हुए मनाने लगी।
मुझे तो काफी हँसी आ रही थी पूजा की इस प्यारी अदा को देख कर।
फिर मैं हामी भरते हुए बोली," अच्छा ठीक है, पर अभी दूसरी पैकेट बाकी है देखने की। उसे भी देख लेंगे फिर पहन के दिखा दूंगी।"
"Thanks भाभी।" पूजा कहते हुए जल्दी से साड़ी समेटने लगी। मैं भी साथ समेट कर उसी पैकेट में रख दी।
फिर दूसरी पैकेट खोलने के लिए बैठ गई।
पहली पैकेट में तो इतनी अच्छी साड़ी मिली जो कि Latest डिजाइन और बहुत ही खूबसूरत के साथ साथ काफी महँगी भी थी।
अब इस पैकेट में कितनी अच्छी और कितनी महँगी होगी।
मैं अगर कितनी भी अनुमान लगाती तो वो विफल ही होती। पूजा और मैं दोनों काफी उत्सुक थे देखने के लिए।
पैकेट खुलते ही मेरी तो आँखें चौँधिया गई।
पूजा भी Wowwww भाभी! कहती हुई एक टक देख रही थी।
गहने से भरी चमचमा रही थी।
पूजा एक एक कर निकालने लगी। मैं तो सिर्फ निहारे ही जा रही थी।
सारे गहने एक दम नई डिजाइन की थी।नेकलेस सेट तो देखने लायक थी। गोल्ड मीनाकारी कलर की बहुत ही खूबसूरत हार थी, जिस पर बहुत ही फैन्सी वर्क की हुई थी। साथ में लटकी हुई छोटी छोटी झुमकी और भी कयामत बना रही थी।
माँग टीका भी बहुत प्यारी थी जिस पर Stone और Diamond जड़ी हुई थी।
सोने की मध्यम सी मोटी मंगलसूत्र तो अद्भुत थी।
साथ ही कान के लिए 3 अलग अलग डिजाइन की रिंग और हुप्स थी। नाक की एक दम छोटी सी पिन, सभी उँगली के लिए अँगूठी, तारीफ के काबिल पायल।
मैं तो हर एक चीज देख हैरान थी। ऐसा नहीं था कि मेरे पास ये सब नहीं थी, थी मगर इतनी सुंदर और महँगी नहीं थी। मैं तो मंत्रमुग्ध हो एक टक देखी जा रही थी।
और ये सोने की घड़ी देख तो मैं मचल सी गई।
सच कहूँ तो मैं अब पूरी तरह से अंकल की दीवानी हो चुकी थी। कोई सगे भी इतनी महँगी गिफ्ट नहीं देता है।
मन तो कर रही थी कि अभी ये सारी गहने और कपड़े पहन के अंकल के बाँहों में जा गिरूँ।
मगर इतनी जल्दी अगर कहती भी तो पूजा जैसी लड़की कुछ और ही समझ लेती। भले ही अभी वो कुछ भी कह लेती मगर वो तो मुझे एक चालू लड़की की नाम जरूर दे देती जो सिर्फ दिखाने के लिए शरीफ बनती है। मन में ही अंकल के प्यार को कुछ दिनों के लिए दबा देने में ही भलाई थी।अंत में एक चीज देख तो हम दोनों एक साथ चौंक पड़ी।
फिर पूजा हंसती हुई हाथ में उठा ली।
एक दम नई मॉडल की मोबाइल फोन थी ये।पूजा जल्दी से ऑन की। ऑन होते ही उसके चेहरे पर एक नाराजगी सी आ गई। उसने फोन मेरे हाथ में पकड़ा के बाहर निकल गई।मैं भी मोबाइल में देखी कि आखिर क्या हुआ इसे।
ओह। इसमें Insert Sim लिखी थी। अब समझ में आ गई कि पूजा कहाँ गई है।मैं भी गेट के पास जा कर सुनने लगी कि क्या कहती है पूजा अंकल से।
"अंकल,फोन आप दिए तो उसमें Sim कौन डालेगा?" अंकल से गुस्से में बोली।
"ओह सॉरी पूजा, Sim मेरे जेब में ही रह गई।"
कहते हुए अंकल हँस दिए। साथ में मम्मी जी की भी हँसी सुनाई दी।
"पहले एक तंग करती थी और अब दो दो बेटी तंग करेगी। झेलते रहिएगा।"मम्मी बोली।

अंकल उठ के तेजी से बाहर की तरफ निकल गए। पूजा और मम्मी एक-दूसरे की तरफ देख हँस दिए। मैं भी अंदर में मुस्कुरा रही थी।
कुछ ही क्षण में बाहर से अंकल के आने की आहट हुई।
तब तक मम्मी जी उठ के बाथरूम की तरफ चली गई। अंकल आते ही मुझे आवाज देते हुए बोले...
"लो सीता बेटा, अपना Sim लो।"
मैं थोड़ी सी सकपका गई,पर तुरंत ही संभलते हुए बाहर की तरफ चल दी।
पूजा और अंकल दोनों कुछ ही फासले पर खड़े थे। मैं आहिस्ते से बढ़ते हुए अंकल के पहुँची और हाथ बढ़ा दी। अंकल हल्की मुस्कान देते हुए Sim दे दिए।
मैं बिना कुछ बोले वापस जाने के लिए आधी ही मुड़ी थी कि अंकल बोले।
"सीता, मेरा उपहार तो पसंद आया ना?"
मैं तो पसीने पसीने हो गई कि अब क्या जवाब दूँ! कुछ ना बोलती तो ये गलत होती।
मैं हिम्मत की और हाँ में अपना सिर हिला दी।
मेरी इस हरकत से अंकल कुछ अलग ही अंदाज में बोले,"पूजा, सीता गुटखा खाती है क्या जो कुछ बोलती नहीं है?"
इतना सुनते ही पूजा और अंकल दोनों जोर से हँस पड़े।
मैं भी अपने आप को नहीं रोक पाई और रोनी सी सूरत बनाते हुए सिर्फ इतना ही कह पाई,"अंकललललललल...."
अंकल अगले ही क्षण हँसते हुए मुझे अपने सीने से लगा लिए।
मैं भी बिना कोई मौका गँवाए अंकल के सीने से चिपक गई।
अंकल के सीने से लगते ही मैं एक रोमांच से भर गई थी।
तभी नीचे मेरे पेट कुछ चुभती हुई महसूस हुई।मैं समझते हुई देर नहीं कि क्या है? ये अंकल का तगड़ा लण्ड था जो कि पूरा तना हुआ था।मैं तो पानी पानी हो गई।
चूँकि अंकल काफी लम्बे थे तो मैं उनके कंधे तक ही आ पाती थी।वर्ना अंकल का विशाल लण्ड मेरी साड़ी फाड़ती हुई सीधी मेरी चूत में जा समाती।
मैं ठीक से संतुलन नहीं बना पा रही थी क्योंकि उनका लण्ड सीधा मेरे पेट को धक्का दे रहा था। मैं अपना सिर अंकल के सीने से चिपकाए थी पर मेरी पेट से नीचे करीब 8 इंच बाहर थी।
मैंने इसी अवस्था में थोड़ी सी ऊपर उठी और फिर नीचे हुई। जिससे अगले ही पल हल्की नीचे की तरफ हुई। मैंने और जोर लगाते हुए लण्ड को नीचे की दबाते हुए पूरी तरह चिपकने की कोशिश की।
किंतु उनका लण्ड अभी भी राजी नहीं थी बैठने के लिए। वो लगातार मुझे बाहर की धकेल रही थी।
अनायास ही मेरे मन में सवाल गूँज उठी कि चंद दिनों बाद जब ये लण्ड मेरी चूत को फाड़ेगा तो मेरी जान ही निकल जाएगी।
अंकल के हाथ मेरी पीठ पर थी और दूसरे हाथ से मेरी बाल को ऊपर से नीचे की तरफ लगातार सहला रहे थे।
अब तक तो अंकल भी समझ गए होंगे कि मैं भी उनके लंड से मजे ले रही हूँ। तभी बगल में खड़ी पूजा की आवाज आई,"अंकल, नई बहू के आते ही आप तो हमें भूल ही जाएँगे, ऐसा लग रहा है।"
अंकल हँसते हुए पूजा की बाँहेँ पकड़ अपनी तरफ खींचते हुए बोले,"अरे नहीं मेरी बच्ची, मैं किसी को नहीं भूल सकता। अब तो पहले से और ज्यादा समय देना होगा आप लोगों को।" और अगले ही पल पूजा भी मेरी बगल से अंकल के सीने में सटी हुई थी।
मैं भी पूजा को थोड़ी सी जगह देने की सोच एक तरफ खिसक गई।
मेरे हटते ही अंकल की भीमकाय लण्ड आजाद हो गया।
अब वो मेरी और पूजा के कमर के बीच दब रही थी। पूजा तुरंत ही इस स्थिति को भांप गई। वो मुस्काती हुई हमें हल्की सी धक्का दे दी। मैं उसकी तरफ देखी तो वो अपनी गोल आँखें नचाती हुई नीचे लण्ड की तरफ इशारा कर दी।
मैं तो डर और शर्म से भर गई और अपनी नजरें नीचे कर ली और अंकल से पुनः चिपक गई।
अंकल अपना चेहरा नीचे करते हुए मेरे गाल के काफी पास लाते हुए बोले,"सीता बेटा,मेरे मन में एक इच्छा जग गई है।अगर तुम हाँ करेगी तो मैं कहूंगा।"
मैं तो सोच में पड़ गई कि अंकल की क्या इच्छा है। सेक्स के लिए तो नहीं कहेंगे। ऐसी सोच दिमाग में आते ही मैं संकोच से भर गई।एक बारगी तो मैं अंकल की हर इच्छा पूरी करने की सोच रखी थी पर आज पहली मुलाकात में कुछ अटपटा लग रहा था।
फिर भी मैं सुनना चाहती थी कि आखिर अंकल क्या कहते हैं तो मैंने एक शब्द में "क्या....."कह अंकल के जवाब का इंतजार करने लगी।
कुछ क्षण पश्चात अंकल बोले,"बहू, मेरी इच्छा थी कि अगर आपको मेरा तोहफा पसंद आया है तो प्लीज एक बार मैं आपको उन कपड़े और जेवर में देखना चाहता हूँ।बस यही मेरी तमन्ना है। और हाँ...जरूरी नहीं कि आपको अभी ही पहननी है।जब भी आपको ठीक लगे तब आप दिखा देना।"
मैं अंकल की इच्छा सुन शर्म से पूजा की तरफ देख हल्की सी मुस्कान दी। पूजा भी हमें देख हँस रही थी।
अंकल को अब ना कहने की तो सोच भी नहीं सकती थी। मैं अंकल के कमीज के बटन पर उँगली फिराते हुए बोली,"ठीक है अंकल, मैं पहन के दिखा दूंगी"
अंकल हाँ सुनते ही हम दोनों को जोर से भीँचते हुए और अंदर चिपका लिए।
अब मेरी संकोच बहुत हद तक जा चुकी थी।
मेरी आँखे आनंद से बंद सी होने लगी थी अंकल की बाँहों में। पर किसी तरफ आँखें खोलते हुए पूजा की तरफ देखी तो वो नीचे इशारा करते हुए कुछ कहने की कोशिश कर रही थी। मैं भी ठीक से समझने की कोशिश की तो वो शायद अंकल के लण्ड की साइज के बारे में कह रही थी।
मैं शर्माते हुए पूजा की तरफ अपनी कमर से हल्की धक्का दे कर साइज मापने की कोशिश की।
हे भगवान! लण्ड तो हम दोनों की कमर से बाहर जा रही थी।
इतनी बड़ी देख मैं तो हैरान रह गई। पता नहीं पूजा कैसे झेलती होगी।
पूजा मेरी हालत देख मंद मंद मुस्कुरा रही थी।
मैं पुनः अपनी आँखें बंद कर अंकल के सीने से लग गई।
तभी अंकल की अगली हरकत देख मैं तो शर्म से मरी जा रही थी।

अंकल पूजा की पीठ पर से हाथ हटाते हुए उसकी गाल पर ले गए और प्यार से उठाते हुए अपने चेहरे की तरफ कर लिए।
फिर अपने होंठ पूजा के होंठों के काफी निकट ले जाते हुए बोले,"मैं तो अपनी बेटी के प्यार से धन्य हो गया हूँ।मैं उनका सदा आभारी रहूँगा जिन्होंने मुझे इतनी प्यारी बेटियाँ दी है।" इतना कहने के साथ ही अंकल के होंठ पूजा की प्यारी होंठो से चिपक गए।
पूजा भी अपनी आँखें बंद कर अंकल को अपनी सहमति दे दी।
इधर मैं इन दोनों की स्थिति देख पसीने से भीँग सी गई थी। ना हटते बन रही थी और ना रहते। इतनी देर से लण्ड की ठोकरेँ खाते मैं वैसे ही पानी बहा रही थी। अब तो और भी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। अंकल एक तरफ से मुझे बाँहों में कसते हुए दूसरी कुंवारी कन्या की रस चुस रहे थे।
कुछ ही देर में दोनों के होंठ जुदा हो गए।
इतनी गहरी किस कर रहे थे कि अलग होना तो नामुमकिन थी पर मैं भी वहीं पर थी जिस वजह से छोड़नी पड़ी।
पूजा कुछ मायूस सी हो गई शायद वो अलग होना नहीं चाहती थी।
"अंकल आप अपना सारा प्यार मुझे ही देंगे क्या? ऐसे में तो भाभी कहीं नाराज हो गई तो...."तभी पूजा मेरी तरफ देख मुस्कुराती हुई अंकल से बोले। अपने बारे में सुन मेरे पसीने छूट पड़े।तभी अंकल मेरे गालोँ को सहलाते हुए चेहरे को ऊपर कर दिए। मेरी दिमाग सुन्न सी हो गई।मैं आँख खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।मेरे होंठ अपने आप कांपने लगी अंकल के अगले वार को सोच के।
"अरे नहीं पूजा,ऐसा करने की भला मेरी कहाँ हिम्मत है कि मैं अपनी सीता बेटी को भूल जाऊँ।" कहते हुए अंकल मेरी गर्म होंठ पर अपने होंठ रख दिए।
मैं तो एक बारगी बिल्कुल ही सिहर गई।
अंकल मेरी निचले होंठ के हिस्से को अपने होंठों से दबा के जीभ चलाने लगे।मैं तो इतनी सी ही में आनंद में खो गई।
अंकल अब पूरी होंठों को अपने कब्जे में लेते हुए जोर से किस करने लगे।मैं उनका साथ तो नहीं दे पा रही थी और ना ही विरोध कर रही थी।
अगले ही पल अंकल अपनी जीभ मेरी मुँह के अंदर डालने की कोशिश करने लगे।मैं ज्यादा रोकने की हिम्मत नहीं कर पाई और एक घायल हिरण की तरह खुद को सौंप दी।
अब उनकी जीभ मेरी जीभ से मिलाप कर रही थी।कुछ देर तक इसी तरह लगातार चुसते रहे।
तभी मेरी बगल से पूजा धीरे से अंकल की बाँहे से छूटते हुए बाहर हो गई। अब मैं अकेली अंकल की बाँहों में कैद मजे के सागर में गोते लगा रही थी। उनका एक हाथ मेरे सर पे और दूसरी हाथ मेरी कमर को सहला रही थी।
कोई 5 मिनट तक चुसने के बाद मेरी होंठ अंकल के होंठ से अलग हुई। मुझ में अब थोड़ी सी भी ताकत नहीं रह गई थी।मैं बेसुध सी अंकल के बाँहों में पड़ी लम्बी लम्बी साँसें ले रही थी।अंकल अब मेरी गालोँ को हौले से सहलाने लगे।
कुछ देर सहलाने के पश्चात।
"सीता बेटा,क्या हुआ?"अंकल धीरे से पूछे।
मैं यूँ ही आँखें बंद किए कुछ नहीं बोली।
तभी पीछे से पूजा सट गई और मेरे गालोँ को चूमते हुए बोली,"भाभी, अंकल के प्यार को आप बुरा मान गई क्या?"
पूजा की बातें सुनते ही मेरे अंदर गुस्से की आग भड़कने सी लग गई।इतना कुछ होने के बाद कमीनी पूछती है कि बुरा मान गई क्या?
अगर बुरा मानती तो मैं कब का यहाँ से चली गई होती।
फिर भी खुद पर नियंत्रण करते हुए ना में सिर हिला कर जवाब दे दी। जवाब पाते ही पूजा हँसती हुई मुझे थैंक्स भाभी बोली और लिपट सी गई।अंकल भी मुस्कुराते हुए एक बार फिर मेरी होंठ पर चुम्बन जड़ दिए।
"बेटा,अब मैं जा रहा हूँ।कुछ लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं।मौका मिलते ही मैं आप लोगों से मिलने आ जाऊँगा। जाऊँ बेटा?"अंकल अपनी बाँहेँ हटाते हुए मेरी गालोँ को सहलाते हुए पूछे।
मैं भी अब थोड़ा फ्रेश होना चाहती थी। इतनी देर से मेरी चूत की पानी घुटने से नीचे आ गई थी बह के।मैं "हूँउँऊँऊँउँ" कह के अंकल के जाने की सहमति दे दी। अंकल थैंक्स कहते हुए मुझे अपने से अलग किए और बाहर निकल गए।
मेरी नजर पूजा पर पड़ते ही शर्म से अपने रूम की दौड़ गई। पूजा भी हँसती हुई पीछे से आई।
तब तक मैं बेड पर मुँह छिपा के लेट चुकी थी।पूजा आते ही मुझसे लिपट के चढ़ गई।
कुछ देर यूँ ही पड़ी रहने के बाद पूजा मुझे सीधी कर दी। मैं अभी भी अपने हाथ से आँखों को ढँक मंद मंद मुस्कुरा रही थी।
अगले ही क्षण पूजा मेरे सीने से साड़ी हटा दी। मेरी तनी हुई चुची पूजा के सामने थी। मेरी हर एक साँस के साथ मेरी चुची भी ऊपर नीचे कर रही थी। तभी पूजा मेरी कमर पर अपनी एक पैर चढ़ाती हुई मेरी एक चुची को दाँतो से पकड़ ली।मैं दर्द से उछल पड़ी।
पूजा हँसती हुई बोली," डॉर्लिँग, अंकल ऐसे ही और बेरहमी से तुझे मजा देंगे। थोड़ी सी बर्दाश्त करना सीख लो।"
"चुप कर बेशर्म। मैं नहीं करवाती।" मैंने पूजा के मुँह को ऊपर की तरफ धकेलते हुए बोली।
"हाँ वो तो मैं जानती ही हूँ कि आप करवाओगी या नहीं। मैं थी इसीलिए वर्ना अभी तक तो तुम अंकल से चुदी होती। कितनी मजे से अंकल का लण्ड अपनी चूत में सटा के खड़ी थी।"ताने देते हुए पूजा बोली।
"प्लीज पूजा,कुछ मत कहो।शर्म आती है।"
मेरी बात सुनते ही पूजा हँस पड़ी और बोली,"ओके भाभी, अब नहीं कहती।अच्छा ये तो बताओ अंकल का पसंद आया कि नहीं।"
मैं हँसती हुई हाँ में सिर हिला दी।पूजा भी मेरी जवाब से इतनी खुश हो गई कि एक बार फिर मेरी चुची पर अपने दाँत लगा दी। मैं उसकी बाल पकड़ जोर से चीख पड़ी।
शुक्र है कि घर में इस वक्त और कोई नहीं थी। पूजा हँसती हुई छोड़ दी।
फिर मेरी साड़ी के ऊपर से ही चूत पर हाथ रखती हुई बोली,"सीता मैडम! जरा इन्हें मजबूत कर के रखना। बहुत जल्द ही इसमें मुसल जाने वाली है।"
मैं चिहुँक के उठ बैठी और हाथ हटाते हुए हँसती हुई बोली," तुम किस दिन काम आएगी।"
पूजा कुछ बोलती, इससे पहले ही मम्मी जी की आवाज सुनाई दी।
"पूजा,किचन का काम नहीं होगा क्या? जल्दी आओ।"
मम्मी की आवाज सुनते ही हम दोनों जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए और किचन की तरफ चल दी।

रात का खाना बन चुकी थी। करीब 9 बज रहे थे। चूँकि गाँव में सब ज्यादा देर तक नहीं जगे रहते। श्याम भी आ चुके थे।आते ही उन्होंने मेरी गालोँ को चूमते हुए खाना खाने की इच्छा व्यक्त की। मैं भी जल्दी से खाना लाई और श्याम खाना खाने बैठ गए।
मैं वहीं पास में बैठ मोबाइल निकाल छेड़छाड़ करने लगी। मोबाइल पर नजर पड़ते ही श्याम बोले,"अरे वाह नई फोन! और क्या सब दिए हैं अंकल मुँह दिखाई में। जरा हमें भी तो दिखाईए।"
मैं मुस्कुरा पड़ी। मेरी अंदर से तो जवाब आ रही थी कि ये सब मुँह दिखाई में नहीं बल्कि चूत चुदाई की अग्रिम रकम मिली है।फिर भी थोड़ी सी शर्माती हुई बोली,"आप पहले खाना खा लीजिए। फिर दिखा देती हूँ।"
"खाना के साथ ही दिखा दो वर्ना खाना पचेगी नहीं।बुरी आदत है मेरी। कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पाता हूँ। प्लीज..." श्याम अपनी अंदर की कमी बताते हुए दिखाने की आग्रह किए।
मैं भी हँसती हुई बोली,"अच्छा दिखाती हूँ ला कर। पूजा जी ले गए थे देखने के लिए"
"तो अब तक खड़ी क्यों हो? जल्दी जाओ ना।" श्याम जल्दी देखने की उत्सुकता में कहे।
मैं भी मुस्काती हुई पूजा के रूम की तरफ चल दी।मम्मी पापा दोनों खाना खा कर सोने चले गए थे। पूजा देर रात जगती है शायद पढ़ने या फिर फोन से बात करने।
मैं पूजा के गेट को नॉक की पर गेट खुली ही थी। नॉक करने के क्रम में ही खुल गई। मैं अंदर आते ही पूजा को श्याम द्वारा अंकल का उपहार देखने की बात बताई।
पूजा हँसती हुई दोनों पैकेट देने के लिए मेरी तरफ बढ़ी। अचानक अगले ही पल पूजा के कदम रुक गए और वो हँसते हुए बोली,"भाभी, ऐसे दिखाने से क्या फायदा? अगर इसे पहन के दिखाओगी तो और झक्कास लगोगी और भैया तो मर मिटेँगे आप पर"
मेरी भी हँसी निकल गई।
"चल रहने दे अभी। वो जल्दी देखने के लिए इंतजार कर रहे हैं।अगर नहीं गई जल्दी तो गुस्सा हो जाएँगे।"
"आप तो बेकार ही टेँशन लेती हो। वो कुछ नाराज नहीं होंगे अगर इसे पहन के जाओगी तो।देखते ही उनका सारा गुस्सा रफ्फू-चक्कर हो जाएगा।"
पूजा तो लगभग सही ही कह रही थी। ऐसे दिखाने और पहन के दिखाने में एक अलग ही रोमांच होगी।
कहावत है कि अगर जिंदगी को मजे से जीना है तो प्रत्येक दिन कुछ-ना-कुछ नया करना चाहिए। बस यही सोच मैं हामी भर दी।
मैं कपड़े चेँज करने बाथरुम की मुड़ी कि पूजा मेरी कलाई पकड़ ली।
"क्यों डॉर्लिँग, अब भी आप हमसे शर्मा रही हो कपड़े चेँज करने बाथरुम जा रही। चंद दिनों बाद तो मेरे सामने ही अपनी चूत उछल उछल के चुदवा रही होगी।"
मुझे भी कुछ शरारत सुझी।
"हाँ,अभी भी कुछ देर में उछल उछल के चुदवाने वाली हूँ। चलो तुम अभी ही देख लेना।"
मेरी बात सुनते ही पूजा तेजी से मेरी निप्पल पकड़ जोर से रगड़ दी। मैं दर्द से कराह उठी। पर पूजा मेरी निप्पल छोड़ी नहीं थी, ऐसे ही मेरे निकट आते हुए बोली,"कुतिया, अब और बोलेगी ऐसी बातें।"
मैं दर्द से तड़प रही थी तो जल्दी से ना कह दी।
मेरी निप्पल छोड़ते हुए पूजा मुस्कुराती हुई बोली," अब जल्दी जाओ वर्ना सच में भैया नाराज हो जाएँगे।"
"कमीनी कितना
दर्द हुआ, कुछ पता है।"
पूजा हँस दी और सॉरी कहते हुए बोली," भैया को बीच में क्यों लाई जो दर्द हुआ।अब जाओ भी बाद में बाद करेंगे।"
मैं भी अब ज्यादा देर नहीं करना चाहती थी। इसीलिए बिना कुछ कहे वहीं पर कपड़े चेँज करने लगी। पूजा ये देख हल्की सी मुस्कुरा दी।
कुछ ही क्षण में सारे कपड़े और गहने अलग पड़े थे। शरीर पर सिर्फ पेन्टी और ब्रॉ थी।मैंने पैकेट से साड़ी निकल कर पहनने लगी।पूजा भी मेरी सहायता कर रही थी।
फिर पूजा के कहने पर मैंने ब्रॉ निकाल दी और बिना ब्रॉ के ही Off-Shoulder वाली ब्लाउज पहनने लगी।
फिर एक एक कर सारे जेवर भी चढ़ा ली। कोई 20 मिनट लगे इन सब चीज करने में।
नीचे तो श्याम खाना खा कर पता नहीं कितने गुस्से में होंगे। जब मैं पूरी तरह तैयार हो गई तो पूजा पीछे से पकड़ बड़ी सी शीशे के सामने ले गई।
मैं तो खुद को देखते ही शर्मा गई।ब्लाउज से मेरी Cleavage काफी हद तक दिख रही थी।ठीक उसके ऊपर लटकी मंगल-सूत्र और नेकलेस काफी सेक्सी बना रही थी। पूजा तो देखते ही हाय कर बैठी।
होंठों पर हल्की गुलाबी रंग की लिपिस्टिक,आँखों में काजल और शरीर पर बेहद सेक्सी सुगंध वाली परफ्यूम पूरे माहौल को सेक्सी बना रही थी। पूजा अपने होंठ आगे कर मेरी उभारोँ पर किस करते हुए बोली,"भाभी,आप तो सेक्स की देवी लग रही हो। सच भैया तो पागल सा हो जाएँगे इस रूप में देख कर।"
मैं सिर्फ हँस कर रह गई।
"भाभी,अब प्लीज जाओ वर्ना अगर मैं नहीं जाने दी तो मनाते रहना भैया को फिर।"पूजा मुझे गेट तक लाते हुए बोली।
मैं भी अब और ज्यादा देर नहीं करना चाहती थी। पर जाते हुए सवाल कर गई।
"पूजा आज तो अंकल के पास जाने वाली थी ना फिर अभी तक यहीं हो?"
"बड़ी ख्याल करती है अंकल को।कहो तो अंकल को ही बुलवा दूँ।"
पूजा के शरारती जवाब सुन मैं मुस्कुरा कर रह गई।
फिर पूजा बोलती है," मैडम, आप चिंता ना करें।आप यहाँ रूम में लण्ड ले रही होगी ठीक उसी समय मैं भी अंकल के रूम में अपनी चूत में लण्ड लेती नजर आ जाऊंगी। अगर देखने की इच्छा हो तो ऊपर छत पर आ जाना, आज लाइट ऑन ही रखने अंकल को कहूंगी।"
मैं उसकी बात सुन हँसती हुई पागल कहती हुई नीचे उतर गई।
अंकल के घर ठीक बगल में ही थी। हमारे छत पर तो सिर्फ पूजा के लिए रूम बनी थी।बाकी छत तो खुली ही थी पर अंकल के छत पूरी तरह बनी हुई थी।दो मंजिला था अंकल का घर।चाहते ते और बना सकते थे पर कोई रहने वाला भी तो चाहिए। उनके बेटे-बेटियाँ सब बाहर रहती हैं। अंकल के घर के हर रूम में काँच की खिड़की लगी हुई थी जिससे अंधेरी रात में अगर लाइट जला कोई हरकत की जाए तो लगभग यह तो मालूम पड़ ही जाती है कि अंदर क्या चल रही है। भले ही कौन कर रहा है ये नहीं दिख पाती हो।
कुछ ही क्षण में मैं अपने रूम के पास पहुँच गई।

पायल की छन छन के साथ रूम में जैसे ही प्रवेश की, श्याम देखते ही रह गए। उनके नजरें ना तो हट रही थी और ना कुछ बोल ही रहे थे।बस लगातार वो कभी मेरी आँखों में देखते तो कभी मेरी होंठों को। कभी मेरी आधी नंगी पेट को देखते तो कभी मेरी उभारोँ को।
मैं तो खुद ही हैरान रह गई कि आखिर श्याम इतने हैरान क्यों हो रहे हैं मुझे ऐसी भेष में देख के।फिर कुछ देर यूँ ही गेट के पास खड़ी रहने के बाद धीरे से श्याम की तरफ बढ़ने लगी।
श्याम के निकट पहुँच कर जब प्यार से उनके गालोँ पर हाथ रखी तो वो ऐसे हड़बड़ा गए मानो नींद से जगे हो।
मेरी तो हँसी छूट पड़ी।फिर प्यार भरी लब्जोँ में पूछी,"ऐसे क्या देख रहे हैं?"
तभी वो मुझे अपनी बाँहों में कसते हुए बोले," मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि मेरे सामने सीता खड़ी है। कसम से बिल्कुल अप्सरा जैसी दिख रही हो आज।"
मैं हँसते हुए बोली,"मुझे तो बस आपकी पत्नी ही रहने दीजिए। ज्यादा सर पर मत चढ़ाइए वर्ना कभी नहीं उतर पाऊंगी।"
"हा.हा.हा..आप जैसी बीबी अगर सर पर भी चढ़ जाए तो मस्ती ही मिलेगी।" मेरी गालोँ को चूमते हुए बोले।
मैं भी अगले ही पल मुस्काती हुई अपने उनके होंठों पर रखते हुए किस करने लगी।
श्याम भी इसी पल का इंतजार कर रहे थे। वे भी मुझे अपनी तरफ जोर से भीँचते हुए मेरी लब को पीने लगे।
मैं तो शाम से गर्म थी ही, जिससे तुरंत ही व्याकुल हो गई।मेरे मुँह से लगातार आहेँ निकल रही थी।मैं खुद ब खुद श्याम से जोर से लिपट गई।
वो अब मेरी होंठ के साथ साथ मेरी गाल,गर्दन,उभारोँ हर जगह चूमे जा रहे थे। मैं तीव्र गति से सेक्स की आग में जलने लगी।
अगले ही क्षण उन्होंने मेरी ब्लॉउज को नीचे सरका मेरी चुची को मुट्ठी में कैद कर लिए। अब वो लगातार मेरी चुची को मसलते हुए लगातार चूमे जा रहे थे। वे भी अब रुकने के ख्याल में नहीं थे। अब और बर्दाश्त कर पाना मेरे लिए असंभव थी।
अगले ही कुछ क्षण में मैं जोर से चिल्ला पड़ी।मेरे दाँत श्याम के कंधे में गड़ चुके थे और मेरे नाखून उनकी पीठ को खरोँच रही थी।
मेरी चूत लगातार मेरी पेन्टी को भीँगोँ रही थी।श्याम भी मेरी पीठ को धीमे धीमे सहला रहे थे।कुछ देर यूँ ही रहने के बाद जब थोड़ी होश में आई तो श्याम बोले,"आज तो मेरी रानी कुछ ज्यादा ही गर्म है। तबीयत से सेवा करनी पड़ेगी आज।"
मैं हल्की सी मुस्कुरा दी पर बोली कुछ नहीं।
"जान, आपके इस रूप को मैं कैद करना चाहता हूँ सो मेरी मदद करो।जब कभी भी काम के वक्त अकेला महसूस करूँगा तो आपकी ये तस्वीर देखते ही मैं अपना अकेलापन भूल जाऊँगा।"
मैं भला कभी मना करने की सोच भी सकती थी क्या?
अगले ही क्षण पूरा कमरा तेज रोशनी से नहा गई जो कि अब तक हल्की रोशनी में थी।
वे एक अच्छी गुणवत्ता वाले कैमरे से मेरी अलग अलग पर नॉर्मल फोटो लेने लगे। अचानक वे रुके और बोले,"डॉर्लिँग, अंकल से उपहार में ये फोन भी मिली है। इसे भी अपने हाथों में रख बात करती हुई पोजीशन बनाओ।"
मैं भी मुस्कुराती हुई फोन ले पोजीशन देने लगी।वे लगातार मेरी हर एक पल को कैमरे में कैद किए जा रहे थे।
"सीता,अब कुछ सेक्सी सी पोज दो।कुछ हॉट भी रहनी चाहिए।"
मैं तो एक बार चौंक के ना कह दी, पर वे जल्द ही हाँ करवा लिए। पर मैं तो ऐसी पोज से बिल्कुल अनजान थी।मेरी तरफ से कोई हरकत ना देख वो तुरंत ही समझ गए कि मुझे नहीं आती ऐसी पोज देने।
फिर वो एक एक कर बताने लगे।मुझे तो शर्म भी आ रही थी।
कभी अंगड़ाई लेने कहते,कभी Cleavage दिखाने कहते,कभी आगे झुकने कहते,कभी साड़ी का पल्लू ब्लॉउज से हटाने कहते,कभी होंठों को दबाते हुए चुची पर हाथ रखने कहते।
ऐसी ही ढेर सारी पोजीशन में फोटो लिए। मैं अब धीरे धीरे एक बार फिर गर्म होने लगी थी।कुछ ही देर में मैं आपा खो बैठी और दौड़ती हुई श्याम के गले लग गई।
"क्या हुआ सीता?"
मैंने अपने हाथ श्याम के लण्ड पर ले जाते हुए बोली,"पहले मुझे ये चाहिए फिर जितनी चाहे फोटो ले लेना।"
श्याम हँसते हुए कैमरे को एक ओर रखते हुए ओके कह दिए।लण्ड को पकड़ते ही मेरे मन में अंकल के लण्ड की लम्बाई घूमने लगी।मैंने उनसे लिपटे ही लण्ड को अपने कमर के तरफ मापने की कोशिश की।
जहाँ अंकल का लण्ड कमर से भी करीब 2 इंच बाहर जा रही थी, वहीं इनका लण्ड 1-1.5 इंच अंदर ही रह गई। मैं थोड़ी सी मायूस जरूर हुई पर अंकल का लण्ड भी अपना समझ हल्की सी मुस्कुरा दी।
श्याम मेरी ब्लॉउज खोलने की कोशिश करने लगे।अगले ही क्षण मेरी चुची खुली हवा खा रही थी और ब्लॉउज सोफे पर पड़ी थी।साड़ी भी चंद सेकंड में ही पूरी खुल गई थी। अब मैं सिर्फ पेन्टी में सारे गहनोँ में सजी थी। श्याम मुस्कुराते हुए एक बार बार मुझ पर टूट पड़े।ऊपर से चूमते हुए धीरे धीरे नीचे की तरफ बढ़ने लगे।मेरी चुची के पास आते ही उन्होंने निप्पल को अपने दाँतों से काटने लगे।मैं तड़प के उनके बाल नोँचने लगी पर वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
तभी उनका एक हाथ नीचे बढ़ कर मेरी जांघोँ को सहलाने लगी। मैं तो रोमांच से सिहर सी गई और जोर जोर से आहेँ भरने लगी।मेरी आँखें अब बंद हो चली थी और पूरी शरीर कांप सी रही थी। अब वो मेरी दोनों चुची को बारी बारी से चूसे और काटे जा रहे थे।
तभी उनका हाथ जांघोँ से ऊपर सरक मेरी गीली पेन्टी पर चली गई।पेन्टी के ऊपर से ही वो मेरी चूत सहलाने लगे।मैं अब लगभग बेहोश सी होती हुई पूरी शरीर को उनके ऊपर छोड़ दी।
वे मेरी हालात समझ मुझे बेड के पास ले जाकर सुलाने की कोशिश किए।पर मैं तो उनको एक क्षण के लिए छोड़ने के मूड में नहीं थी।
तब मुझे बेड पर आधी ही सुला दिए।मेरी कमर से नीचे बेड से बाहर लटक रही थी और कमर से ऊपर बेड पर थी। ऐसी अवस्था में मेरी चूत ऊपर की तरफ निकल गई थी जिस पर श्याम अपना लण्ड चिपकाए मुझ पर लेटे थे।

श्याम कुछ देर लेटे लेटे ही चूमते रहे। मैं एक नागिन की तरह मचल रही थी। अगले ही पल श्याम के हाथ मेरी साड़ी खोलने लगे और चंद घड़ी में ही साड़ी अलग पड़ी हुई थी।ब्लॉउज कब निकली ये तो मुझे भी नहीं मालूम।सिर्फ पेन्टी में पड़ी मस्ती के सागर में लगातार गोते लगा रही थी।
श्याम के होंठ मेरी नाभी को कुरेदने लगे थे।श्याम के बाल पकड़ मैं अपने सिर को बाएँ दाएँ करते हुए तड़प रही थी।कुछ देर मेरी नाभी से खेलने के पश्चात श्याम नीचे की तरफ बढ़ने लगे। उनकी गर्म साँसें अब मेरी भीँगी हुई चूत से टकरा रही थी।श्याम के मुँह से मदहोश सी आह निकल पड़ी। वे अपनी उँगली पेन्टी में फँसाते हुए नीचे करते हुए मुझे जन्मजात नंगी करने लगे। अगले ही पल श्याम अपनी दो उँगली मेरी चूत की छोटी सी फाँक पर नीचे की तरफ हौले से चलाने लगे। मैं गुदगुदी और उत्तेजना से मचल उठी। मैं सहन नहीं कर पा रही थी, तेजी से उनके हाथ पकड़ के उन्हें रोक दी।
हाथ रुकते ही वे अगले हमले करते हुए अपने होंठ मेरी चूत में चिपका दिए। मेरी चीख छूटने लगी।पर वे रुकने के मूड में नहीं थे। जीभ से मेरी चूत को कुरेदने लगे थे। मैं अब उनके हमले सहन नहीं कर पा रही थी। उनके बाल पकड़ती हुई बोली," प्लीज श्याम, अब और नहीं वर्ना मैं मर जाऊंगी।" और मैं लगभग रोने सी लगी थी।
श्याम भी मेरी हालत शायद समझ गए। उन्होंने मेरे दोनों पैर उठा बेड पर रखते हुए मेरी गर्दन पकड़ते हुए किनारे में सीधी लिटा दिए। अपना अंडरवियर अलग करते हुए मेरे पास आते हुए बोले,"जान प्लीज आज मेरा भी चुस दो ना" कहते हुए अपना लण्ड मेरे नाक के निकट ला दिए।
"नहीं,क्रीम लगा लीजिए ना प्लीज।"
"प्लीज, चुस नहीं पाएगी तो कम से कम अपने मुँह में एक बार भर लो सिर्फ। थोड़ी भी गीली हो जाए तो क्रीम लगाने की जरूरत नहीं होगी।"
मैं उनके तरफ देखी तो काफी तड़पे हुए लग रहे थे। फिर मेरी नजर उनके लण्ड पर पड़ीं जो कि प्रीकम से चमक रही थी, मैंने अगले ही पल अपने होंठ खोलते हुए लण्ड को मुँह में भर ली।उनके मुँह से एक तड़प से भरी आहहहह निकल गई। मुझे कुछ ही क्षण में उबकाई सी आने लगी पर किसी तरह उनके आधे लण्ड को मुँह में भर चूसती रही। चंद घड़ी चुसने के पश्चात लण्ड निकालते हुए बोली,"प्लीज, अब और नहीं।"
श्याम ओके कहते हुए मुझे एक बार फिर जांघो के नीचे हाथ रखते हुए पहले वाली पोजीशन में कर दिए।
फिर अपना लण्ड मेरी चूत से सटाते हुए रगड़ने लगे। मैं अब पूरी तरह से मचल गई। मैं अपने पैर उनके कमर में कसते हुए उनका लण्ड चूत के अंदर करने की कोशिश करने लगी।
मेरे इस प्रयास से उनका सुपाड़ा मेरी चूत में फँस गई। अगले ही क्षण वे मेरी दोनों चुची को अपने हाथों में भरते हुए जोरदार धक्का दे दिए। मैं आहह.ह.ह.ह.ह.ह.ह.ह करती हुई जोर से चिल्ला पड़ी। उनका पूरी लण्ड मेरी चूत में जा समाई थी। अगर वे मेरी चुची को नहीं पकड़ते तो शायद मैं पीछे दीवार से जा टकराती।
कई बार चुदी होने के बावजूद मेरी चूत में अभी भी दर्द हो रही थी। ऊपर से मेरी चुची को कस के पकड़ने से मेरी दर्द दुगुनी हो रही थी। पर आज मैं दर्द को पूरी तरह से लेना चाहती थी ताकि आगे इतनी दर्द ना हो।
तभी उन्होंने अपना लण्ड पूरी तरह से बाहर निकालते हुए पुनः धक्का दे दिए। मेरी कराह निकल पड़ी। अब वे मेरी तरफ झुकते हुए मेरी होंठों को चूमते हुए बोले,"थैंक्स सीता, इसी तरह दर्द सहना सीख लो और पूरी मजे लो"
मैं मन ही मन सोचने लगी कि आप ठीक कह रहे हैं क्योंकि मुझे तो अंकल के विशाल लण्ड से चुदना जो है।
अगले ही पल वो सीधी होते हुए अपना लण्ड धीमे से अंदर बाहर करने लगे। मेरी दर्द से आहेँ अभी भी निकल रही थी। कुछ ही देर में मेरी आहेँ सिसकारियाँ में बदल गई। इतना सुनते ही वे अब तेजी से मुझे पेलने लगे। मेरी आहेँ अब हर धक्के के साथ तेज होने लगी थी। उनके हर धक्के के साथ मेरे पाँव में पायल सुर से सुर मिला रही थी।उनका लण्ड हर बार जड़ तक मेरी चूत में अंदर होती और बाहर निकलती। अब मैं मजे के सागर में डुबकी लगा रही थी। दर्द काफी कम हो रही थी चूत में। चुची की दर्द चूत के मजे में मालूम ही नहीं पड़ रही थी। कमरे में तेजी से चल रही पंखे हम दोनों की गर्मी को नहीं हटा पा रही थी। वो तो हम दोनों की मधुर व सेक्सी आवाजें को कम करने का काम कर रही थी बस।
कोई 10 मिनट तक लगातार धक्के पे धक्के लगाते रहे और मेरी चूत की धज्जियाँ उड़ाते रहे। इस दौरान मैं दो बार पानी छोड़ चुकी थी जिसका मुझे आभास तक नहीं हुआ। तभी उनके मुँह से तेज आवाज निकलने के साथ धक्के भी तेज होने लगे। शायद अब वे भी अपने मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे।उनके साथ साथ मैं भी तीसरी बार पानी छोड़ने के कगार पर थी।
तभी उनकी एक तेज चीख निकली और मेरे शरीर पर गिर पड़े।
नीचे उनका लण्ड लगातार झटके लेते हुए मेरी चूत को अपने पानी से सरोबार किए जा रहा था।मेरी चूत भी ठीक उसी पल पानी छोड़ दी। बेड पर तो बाढ़ सी आ गई थी।मैं तो कुछ होश में थी पर श्याम को तो कुछ भी होश नहीं था। मैं उनके माथे पर प्यार से किस करती हुई उनके बालों को सहलाने लगी। उनका लण्ड अभी भी मेरी चूत में ही पड़ी थी।
कुछ देर बाद जब वे होश में आए तो उठ के बाथरुम की तरफ जाने लगे। मैं भी नंगी ही उनके पीछे फ्रेश होने चल दी। अच्छी तरह फ्रेश हो के वापस रूम में आई और बचे जेवर खोलने लगी तो वो तुरंत टोकते हुए बोले,"एक मिनट जान...."
फिर वो कैमरा उठाते हुए बोले,"कुछ ऐसी फोटो भी रहनी चाहिए।"
मेरी तो हँसी निकल पड़ी, पर मना नहीं कर पाई। वे मुझे नंगी सिर्फ जेवर से लदी एक से बढ़ एक फोटो उतारने लगे। मैं अपनी हँसी रोक नहीं पा रहे थी इनकी शरारत देख। मेरी चुची,चूत,जांघोँ,चूतड़, बगलेँ आदि की अलग अलग फोटो लिए। फिर मैं गहने हटा दूसरी साड़ी पहन के उनके गले से लगती हुई चिपक के सो गई। 

सुबह जब मेरी नींद खुली तो पूरा बदन टूट रहा था। बगल में श्याम भी पूरी नींद में सो रहे थे।उनका एक हाथ अभी भी मेरी चुची पर थी। धीरे से हाथ हटाते हुए मैं बेड से उतरी और फ्रेश होने बाथरुम की तरफ बढ़ गई। फ्रेश होने के बाद मैं किचन में गई। तब तक मम्मी पापा भी जग गए थे।जल्दी से चाय बनाई और मम्मी पापा को देने के बाद श्याम को देने के बढ़ गई।अभी भी वे बेसुध हो कर सो रहे थे।मैं मुस्कुराती हुई उनके होंठों पर Morning Kiss जड़ दी। वे तुरंत ही नींद से जग गए। फिर मैंने उनकी तरफ चाय बढ़ा दी।वे चाय लेते हुए बोले,"थैंक्स डॉर्लिँग, काश पहले भी इतनी अच्छी Morning Kiss देने वाली कोई होती!"
"झूठ क्यों बोलते हैं? आज कल तो अधिकांश लड़कों की प्रेमिका रहती है। आप थोड़े ही सन्यासी हैं।"मैं भी मजाक करते हुए जवाब दी।
"अगर प्रेमिका रहती तो मुझे इतना प्यार करने वाली बीबी थोड़े ही मिलती। वैसे मैं भी चाहता था कि कोई Girlfriend हो पर समय की कमी और पापा के डर की वजह से कभी हिम्मत नहीं हुई।"
मैं हँसती हुई जाने के मुड़ते हुए बोल पड़ी,"अच्छा ठीक है, आप अपनी प्रेम कहानी बाद में सुनाईएगा। जल्दी से फ्रेश हो जाइए, मैं नाश्ता बनाने जा रही हूँ।"
"जैसी आज्ञा आपकी"कहते हुए वे भी बेड से नीचे उतर गए। मैं उनकी बातें सुन हँसती हुई किचन की तरफ चल दी। तब तक पूजा भी नीचे आ गई थी और चाय पी रही थी। हम दोनों की नजर मिलते ही एक साथ हम दोनों मुस्कुरा दिए। फिर मैं किचन के काम में लग गई। पूजा और मम्मी भी हमारी सहायता करने आ गए। मम्मी के सामने पूजा से किसी तरह की बात संभव नहीं थी।
फ्रेश होने के बाद श्याम नाश्ता कर बाहर चले गए। सारे काम निपटा मैं भी नाश्ता की और आराम करने चली गई। पूजा भी नाश्ता करने के बाद अपने रूम में चली गई थी।
दिन के करीब 12 बजे श्याम आए।आते ही पूछे,"मोबाइल दो तो अपना।"
मैं फोन उनके तरफ बढ़ा दी। कुछ देर छेड़छाड़ करने के वापस देते हुए बोले," कल रात वाली सारी फोटो गजब की आई है। देख लेना फोन में डाल दिया हूँ।"
मैं हँसते हुए फोन ले ली। उन्हें खाने के लिए पूछी तो वे मना करते हुए बाहर निकल गए। शायद मुझे ये तस्वीर देने के लिए ही आए थे।
उनके जाते ही मैं तकिया के सहारे औँधे मुँह लेट गई और फोटो देखने लगी।
वाकई मेरी सभी तस्वीरें काफी सुंदर लग रही थी। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि मुझ पर अंकल के गहने और कपड़े इतने अच्छे लगेंगे। मैं हर एक तस्वीर देख आराम आराम से देख रही थी।
तभी मेरी नंगी चुची की तस्वीरें आ गई।मैं देख के शर्मा गई, पर फिर गौर से देखने लगी। सच में काफी सेक्सी थी मेरी चुची। चुची के ठीक ऊपर लटकी नेकलेस और मंगलसूत्र, और भी सुंदरता में चार चाँद लगा रही थी।
अगली फोटो देखते ही मैं पानी पानी हो गई। मैं बेड पर लेटी एक हाथ से चुची दबा रही थी और दूसरी हाथ चूत पर रखी थी। फिर अगली फोटो में अपनी चुची को खुद ही चुसने की कोशिश कर रही थी।
इसी तरह ढेर सारी तस्वीरें आती गई और मैं कब अपनी पानी छोड़ती चूत सहलाने लगी,मालूम नहीं।
अब मुझे साड़ी के ऊपर से सहलाने में दिक्कत हो रही थी तो बिना किसी डर के साड़ी कमर तक कर ली और पेन्टी में हाथ डाल चूत में 2 उँगली घुसेड़ दी।
मैं तस्वीरें देखने में पूरी तरह से मग्न चूत को शांत करने की प्रयास कर रही थी।
मैं शायद पहली लड़की होऊँगी जो खुद की नंगी तस्वीरें देख अपनी चूत से पानी छोड़ दी। पर क्या करती तस्वीर थी ही इतनी गर्म।
अचानक ही मेरे हाथ पर किसी ने पकड़ लिए। मैं मोबाइल फेंकते हुए पलटी तो ये पूजा थी। मैं गेट के उल्टी तरफ सोई थी जिस वजह से पूजा को आते नहीं देख पाई।मैं जल्दी से साड़ी ठीक करने के लिए उठना चाहती थी कि पूजा दूसरे हाथ से धक्का दे कर लिटा दी और अगली वार करती हुई मेरी एक पैर को बेड से बाहर की तरफ खींच दी। फिर तेजी से मेरे दोनों पैरों के बीच आती हुई अपने होंठ मेरी गीली चूत पर भिड़ा दी। मैं पहले ही फोटो देख गर्म थी ही, अब पूजा आग में घी डालने का काम कर रही थी। मैं पूजा को हटाने का भरपूर प्यार की पर वो तो चुंबक की तरह चिपकी थी। मैं ज्यादा देर तक विरोध नहीं कर पाई और खुद को पूजा के हवाले कर दी।
दोनों भाई बहन की क्या पसंद मिलती थी, रात में श्याम इसी अवस्था में चोद रहे थे और दिन में पूजा मेरी चूत चुस रही है।
अचानक मैं चीखते-2 बची। पूजा मेरी दाने को अपने दाँतों से पकड़ खींच रही थी। मैं अपनी चीख को दबाए पूजा के बाल नोँच कर हटाने का प्रयास कर रही थी,पर मेरे हाथों में इतनी ताकत नहीं थी कि सफल हो पाती।
मैं ज्यादा देर तक पूजा के इस वार को नहीं सह पाई और एक हल्की चीख के साथ झड़ने लगी। पूजा पुच्च-2 करती हुई सारा पानी गटकने लगी। मैं उल्टे हाथों से बेडसीट पकड़े लगातार पानी बहाए जा रही थी।नीचे पूजा आनंदमय मेरी चूत सोखने में लगी हुई थी।
कुछ पल के बाद पूजा उठी और मुझे बेड पर बैठा दी। फिर मेरी आँखों में देखते हुए मुस्कुराते हुए पूछी," क्यों री कुतिया, अकेले ही चुदाई देख मजे लेती रहती है। कम से कम मुझे भी बुला तो लेती।"
पूजा द्वारा दी गई गाली सहित प्रश्न से मेरी हँसी निकल पड़ी। पूजा हमें गाली भी देती है तो पता नहीं मुझे तनिक भी बुरी नहीं लगती। मैं हँसती हुई बोली,"नहीं फिल्म नहीं थी। कुछ और थी।"
"कुछ और.....? दिखा तो फोन क्या है कुछ।"पूजा आश्चर्य से पूछते हुए बोली।
मैं मना करती हुई बोली,"नहीं तुम किसी को बता देगी।"
"पागल, इतना कुछ होने के बाद भी डरती हैं कि बता दूंगी।चल दे जल्दी फोन।"पूजा मेरी फोन की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोली।

मैं भी मुस्कुरा के फोन लेने दी पूजा को। फिर हम दोनों साथ बैठ गए और पूजा तस्वीरें निकालने लगी।
मेरी नंगी तस्वीरें देखते ही पूजा तो बेहोश होते होते बची। उसकी नजरें तो हमसे पूछे जा रही थी कि भैया भी इतने हॉट हैं क्या, पर बोल कुछ नहीं रही थी।
"रात में सेक्स के बाद बोले मुझे ऐसा करने और फोटो खिँचवाने तो खिँचवाई। अब मुझे देखना बंद करो और ये बताओ कैसी लगी तस्वीरें?" पूजा को चुप देख मैं अपनी सफाई देते हुए बोली।
"Wowwww! भाभी, मैं नहीं जानती थी कि आप नंगी किसी मॉडल से कम नहीं लगोगी। ऐसी रूप में देख के तो बड़े से बड़े हिरोईन भी पानी नहीं माँगेगी।"पूजा चहकते हुए तारीफ करने लगी।
मैं उसकी बात सुन झेँप सी गई।फिर वो एक एक तस्वीरें देखने लगी। देखने के क्रम में उसके हाथ अपनी सलवार में धँस सी गई। वो भी शायद गर्म होने लगी थी। अनायास ही पूजा बोली," भाभी, एक बात बोलूँ।"
मैं "हम्म" करती हुई उसकी तरफ देखने लगी।
"मेरी प्यारी भाभी, ऐसी फोटो देख तो तुम कहीं से भी मेरी शरीफ भाभी नहीं लगती। बिल्कुल जिला टॉप रण्डी लग रही हो।"कहते हुए पूजा अपने चूत को मसलते हुए हँस दी।
मैंने पीछे से एक चपत लगाते हुए बोली,"कुतिया तेरे से कम ही रण्डी लगती हूँ।"
"पता है पर इस रेस में बहुत जल्द ही तुम हमसे भी आगे निकल जाएगी।"पूजा थोड़ी सी चिढते हुए बोली। पूजा की उँगली अब चूत से हट गई थी, पर झड़ी नहीं थी।
पूजा की बात सुन मेरी दिल के किसी कोने में ये बात समा गई।शायद कुछ हद तक सही कह रही थी क्योंकि 3 दिन की चुदाई में ही मैं Once More.... कहने लगी थी।
तब तक पूजा सारा तस्वीरें देख चुकी थी। फिर उसने सारी तस्वीरें अपने फोन में भेजने लगी। मैं कुछ कहना चाहती थी पर रुक गई क्योंकि वो बिना लिए तो मानती नहीं।
सिर्फ इतना ही कह सकी,"पूजा, किसी को वो वाली फोटो दिखाना मत प्लीज।"
पूजा हाँ में सिर हिलाती हुई फोटो भेजती रही। जैसी ही सारी फोटो सेन्ट हुई कि पूजा की फोन बज उठी।
पूजा नम्बर देखते ही मुस्कुरा दी, फिर जल्दी से इयरफोन अपने कान में लगाने लगी। अचानक ही इयरफोन की एक स्पीकर मेरे कान में लगा दी और बोली,"अंकल है, कुछ बोलना मत सिर्फ सुनना।"
मैं दबी हुई आवाज में हँसती हुई हाँ में सिर हिला दी। अंकल का नाम सुनते ही मेरी शरीर भी रोमांचित हो गई थी। तभी अंकल की आवाज आई।
"हैल्लो...."
"हाँ अंकल, कहाँ हैं आप? मैं आपको घर गई थी देखने आज सुबह।"
"अरे पूजा वो अचानक ही मुझे पटना निकलना पड़ा। चुनाव की वजह से दौड़-धूप तो लगी ही रहती है।"अंकल अपनी सफाई देते हुए बोले।
"अच्छा आना कब है?"तब पूजा एक समझदार बच्ची की तरह पूछी।
"फुर्सत मिलते ही आ जाऊँगा। अच्छा अभी तुम क्या कर रही हो।"
पूजा बुरी सी सूरत बनाते हुए बोली,"आपके बिना ज्यादा कुछ क्या करूँगी। बस अपनी चूत में उँगली कर गर्मी निकाल रही थी।"
मेरी तो हँसी निकलते-2 बची।
"हा.हा.हा.हा. रात में 2 बार तो पेला था फिर प्यास नहीं गई।"अंकल की हँसती हुई आवाज आई। मुझे तो शर्म के साथ मजे भी आ रही थी जिस वजह चुपचाप सुनी जा रही थी।
पूजा बात को बढ़ाते हुए बोली,"अंकल, रात में आप चोद तो मुझे रहे थे पर मैं दावे से कहती हूँ कि आपके मन में कोई और थी। कौन थी वो.....?"
पूजा की बात सुन तो मैं भी अचरज में पड़ गई। कितनी शातिर दिमाग रखती है।
"हा.हा.हा. अब तुमसे क्या छुपाना पूजा। कल रात मैं सीता को याद कर तुम्हें चोद रहा था।" अंकल सीधे अपने हथियार रखते हुए बोले। मैं तो एक बार अपना नाम सुन शर्मा गई, पर उससे ज्यादा हमें पूजा की तेज दिमाग देख दंग रह गई।
पूजा मुझे आँख मारते हुए बोली,"Wowww! अंकल, एक तीर दो निशाने। तभी तो मैं सोच रही थी कि इतनी धमाके से मेरी चुदाई क्यों हो रही है।
पूजा की बात सुन अंकल सिर्फ हँस दिए,साथ मैं भी मुस्कुरा दी। तभी पूजा बोली,"वैसे आपको पता है मैं अभी कहाँ से आई हूँ।"
मैं भी सोच में पड़ गई कि पूजा आखिर कहाँ गई थी।उधर अंकल भी उत्सुकता से भरी आवाज में बोले,"कहाँ गई थी?"
पूजा तभी मेरी साड़ी के ऊपर से चूत दबाते हुए बोले," आज एक मस्त चूत का रसपान करके आई हूँ।"
पूजा के इतना कहते ही मेरी तो घिघ्घी बँध गई। तुरंत ही कान पकड़ते हुए मेरा नाम नहीं बोलने के लिए पूजा से आग्रह करने लगी।
तभी अंकल की सिसकारि भरी आवाज सुनाई दी,"आहहहहह पूजा! कौन थी वो जल्दी बता ना। मेरा लण्ड तो पूरा उफान पर आ गया है।"
पर पैदाइशी हरामिन पूजा मेरी एक ना सुनी और बोली," मैं अपनी जान सीता भाभी की चूत का भोग लगा के आई हूँ। आपको यकीन नहीं होगा अंकल कि कितनी स्वादिष्ट थी चूत। आहहहहह.... मजा आ गया आज।" अपना नाम सुनते ही मैं पूजा के गले दबाने लगी। पर फुर्ति से पूजा हाथ हटा मेरे बाल पीछे से पकड़ी और सलवार के ऊपर से ही अपनी चूत की तरफ गिरा दी और केहुनी मेरी पीठ पर गड़ा दी। मैं छटपटा के उसकी चूत पर मुँह रख पड़ी रही और गीली चूत की महक लेते हुए अंकल की बातों से मजे लेने की कोशिश करने लगी।
"ओफ्फ सीता। छिनाल,कुतिया खुद मजे लेती है। हमें भी तो एक बार सीता की चूत दिला दे। आह. बर्दाश्त नहीं होती अब।"
मैं नीचे पड़ी चूत की गंध पा मदहोश होने लगी थी। अगले ही पल मैं सलवार के नाड़े खोलने की कोशिश करने लगी। पूजा मेरी स्थिति को समझते हुए तेजी से बोली," अंकल, आप के लिए ही तो जुगाड़ कर रही हूँ। अच्छा ठीक है, मैं अभी फोन रखती हूँ। बाद में बात करूँगी।" इतना कह पूजा फोन काट दी और सलवार पूरी खोल दी और चूत मेरे मुँह से चिपका दी। मैं भी उसकी चूत पर टूटते हुए जोरदार चुसाई शुरू कर दी। कुछ ही देर में पूजा एक अंगड़ाई लेती चीखते हुए झड़ गई। ढेर सारी पानी पूरे चेहरे पर आ गई थी। पूजा लगभग बेहोश हो आँखें बंद कर चुकी थी।
जिंदगी में आज पहली बार चूत चूसी थी।

इसी तरह पूजा के साथ दिन भर हँसी मजाक और फिर रात में श्याम से चुदाई चलती रही। जैसा कि गाँवों में ये एक रिवाज है कि नई दुल्हन 3 या 9 दिन के बाद वापस अपने मायके चली जाती है। मैं भी जिंदगी के हसीन पल अपनी यादों में समेट वापस अपने मायके चली आई थी। जिंदगी में इतनी हसीन यादें फिर कभी नहीं आती है, ये एक कटु सत्य है। समय मिलते ही श्याम और पूजा से अच्छी बुरी बातें फोन पर शुरू कर देती थी। अंकल तो अभी तक व्यस्त ही थे। उनसे मिले बिना ही मैं आ गई थी, इसका मुझे काफी मलाल था।
आते वक्त पूजा बोली थी कि जब तक आप अंकल को एक बार फोन नहीं करोगी, तब तक अंकल आपको फोन नहीं करेंगे। मैं अंकल से भी बात करना चाहती थी पर शर्म की वजह से हिम्मत नहीं कर पा रही थी फोन करने की।
उधर श्याम की छुट्टी भी समाप्त हो चुकी थी तो वे वापस ड्यूटी पर चले गए थे। कुछ दिन पूजा का भी रिजल्ट आ गया और वो भी अच्छे नम्बरोँ से पास हो गई थी। पूजा सबसे पहले हमें ही ये खुशखबरी सुनाई। और साथ में ये भी बताई कि भाभी,दो दिन बाद मैं भैया के जाऊंगी और वहीं रह आगे की पढ़ाई करूँगी। मैं ये सुन पूजा से कहीं ज्यादा खुश हुई। खुश क्यों नहीं होती आखिर कुछ दिन बाद तो मैं भी वहीं जाऊंगी।
दो दिन बाद पूजा श्याम के पास चली गई थी। पूजा वहाँ जाते ही फोन से ही वहाँ के बारे में बताती रही।
इधर मैं अपने मायके में जब से आई हूँ, भाभी तो रोज ही सताती रहती है।
हमेशा कहती रहती है कि जब से ससुराल से आई है, हमेशा वहीं का गुणगान करती रहती है। आखिर क्यों नहीं करती, ढेर सारी चुदाई जो मिल रही थी।
ससुराल से आने के बाद तो मेरी हवस इतनी बढ़ गई कि मैं सभी को सेक्स भरी नजरों से देखने लगी थी। यहाँ तक कि मैं खुद के सगे भैया से भी चुदने की इच्छा रखने लगी थी।
एक दिन मैं घर में बोर हो रही थी। तभी मेरी नजर भैया पर पड़ी जो कि देहाती रूप में लुँगी और गंजी पहने, हाथ में बड़ी सी खाली थैली रखे बाहर जाने वाले थे। मेरे मन में अचानक शरारत सुझी और भैया को पीछे से आवाज दी,"भैया,कहीं जा रहे हो क्या?"
भैया मेरी तरफ पलटे और बोले,"हाँ सीता, वो आम अब पकने लग गए हैं, वहीं बगीचे जा रहा हूँ। कुछ खाने लायक हुआ तो लेते आऊँगा।"
"भैया,काफी दिन से बगीचे नहीं गई हूँ।हमें भी ले चलो ना।" मैं आग्रह करती हुई बोली। तब तक भाभी भी बाहर आ गई थी। आते ही बोली,"हाँ हाँ ले जाइए ना। घर में बैठी बोर हो रही है, बाहर घूम लेगी तो मन बहल जाएगा। ससुराल जाएगी तो पता नहीं कब मौका मिलेगा।"
भाभी के कहते ही भैया हँस पड़े और जल्दी तैयार हो चलने के लिए बोल बाहर इंतजार करने लगे। मैं झटपट अंदर गई और जल्दी से नाइटी खोली। फिर सफेद रंग की चोली-घाँघरा पहनी और चुन्नी डालते हुए निकल गई। भैया की नजर मुझ पर पड़ते ही उनका मुँह खुला सा रह गया। उनकी नजर मेरी चोली में कसी हुई चुची पर अटक सी गई। अगले ही पल जब उनकी नजर ऊपर उठी तो वे शर्म से झेँप से गए। मेरी शैतान नजर उनकी चोरी जो पकड़ ली थी। मैं हल्की ही मुस्कान देते हुए उनके पास जाते हुए बोली,"अब चलो भैया।"
भैया बिना कुछ कहे बाईक स्टॉर्ट किए और मेरे बैठने का इंतजार करने लगे। मैं भी बैठी और चलने के हाँ कह दी।
बगीचा घर से करीब 3 किमी दूर थी। इनमें 1 किमी तो गाँव थी और बाकी के सुनसान सड़क,जिसके दोनों तरफ बड़ी बड़ी वृक्ष थी। सड़क उतनी अच्छी नहीं थी पर वृक्षों के रहने से कम से कम धूप से राहत तो मिलती है। गाँव भर तो मैं ठीक से बैठी रही पर जैसे ही गाँव खत्म हुई, मैं भैया की तरफ सरक गई।
अचानक ही बाईक गड्ढे में पड़ी और पूरी तरह से भैया के शरीर पर लद गई। मैं संभलती हुई सीधी हुई तो भैया बोले,"सीता,अब सड़क अच्छी नहीं है सो तुम मुझे पकड़ के बैठो वर्ना अगर गिर गई तो तुम्हें चोट तो लगेगी ही, साथ में हमें भी खाना नहीं मिलेगा।"
भैया के बोलते ही मैं जोर से हँस पड़ी और ओके कहते हुए उनके कमर पकड़ती हुई चिपक के बैठ गई। मेरी एक चुची अब भैया के पीठ में धँस रही थी। जैसे ही बाईक किसी गड्ढे में पड़ती तो मेरी चुची पूरी तरह रगड़ जाती। भैया को भी अब मेरी इस शैतानी खेल में मजा आने लगा था। वो तो अब जान बूझकर गड्ढे होकर चल रहे थे। मैं ये देख हल्के से मुस्कुराते हुए और कस कर अपनी चुची रगड़वाने लगी।
तभी सामने से एक लड़का साइकिल से आता हुआ दिखाई दिया। मुझे तो पहले थोड़ी शर्म हुई पर अगले ही क्षण बेशर्म बनते हुए ऐसे ही चिपके रही। पास आते ही वो लड़का लगभग चिल्लाते हुए बोला,"ओढनी गाड़ी में फँसेगा!"
भैया तेजी से ब्रेक लगाते हुए रुके। बाईक से मैं भी उतरी तो सच में मेरी चुन्नी बिल्कुल चक्के के पास लहरा रही थी। अगर कुछ और देर हो जाती तो पता नहीं क्या होता। तब तक वो लड़का भी जा चुका था। मेरी नजर भैया पर पड़ी तो देखी वो मुस्कुरा रहे थे। मैं भी हल्की ही हँसी हँस दी। अगले ही पल वे मेरी चुन्नी एक झटके से सीने से हटाते हुए बोले,"जान बचे तो लाख उपाय। अब देखने वाला कौन है जो तुम्हें शर्म आएगी। चलो ऐसे ही चलते हैं। वापस गाँव आने से पहले फिर ओढ लेना।"
फिर भैया चुन्नी को डिक्की में बंद कर दिए। मैं भैया की मस्ती वाली सलाह सुन शर्माती हुई मुस्कुरा दी। अगले ही क्षण बाईक स्टॉर्ट हो चुकी थी। मैं भी बेहया बनते हुए भैया के शरीर पर लगभग चढती हुई चिपक के बैठ गई।
और अब मैं अपने दोनों हाथ से भैया की कमर कसते हुए जकड़ ली। अब तो मेरी दोनों चुची उनकी पीठ में धँस गई थी और मैं अपना चेहरा उनके कंधे पर टिका दी थी।
अचानक बाईक एक गहरी गड्ढे में गई और मेरी चीख निकल गई। चीख चुची के दर्द की वजह से आई थी क्योंकि मेरी चुची काफी जोर से रगड़ा गई थी। साथ में भैया के मुँह से भी आह निकल गई। ये आह मेरे हाथ उनके लण्ड पर घिसने की वजह से आई थी। हम दोनों हल्की हँसी हँसते हुए बिना कुछ बोले बगीचे की तरफ बढ़ने लगे।

कुछ ही देर में अपने भैया के साथ बगीचे पहुँच गई थी। मैं उतरी और अपनी गांड़ पूरब पश्चिम करती आगे बढ़ गई। सिर्फ चोली में मेरी चुची मानो दो बड़े-2 पर्वत जैसी लग रही थी।पीछे भैया भी जल्दी से बाईक खड़ी की और लगभग दौड़ते हुए पीछे-2 चलने लगे। भैया की हालत देख मेरी तो हँसी निकल रही थी पर किसी तरह खुद को रोक रखी थी। एक पेड़ के पास रुकते हुए मैं तेजी से पलटी।
ओह गॉड! भैया अपनी जीभ होंठ पर फेरते हुए लुँगी के ऊपर से लण्ड सहलाते हुए आ रहे थे। मुझ पर नजर पड़ते ही भैया हड़बड़ा कर हाथ हटा लिए। मैं भी बिना शर्म किए हल्की ही मुस्कान देते हुए बोली," भैया, अब जल्दी से आम खिलाओ।"
भैया हाँ कहते हुए एक पेड़ की तरफ बढ़े और चढ़ गए। कुछ ही दूर चढ़े थे कि तभी उनकी लुँगी हवा में लहराती हुई नीचे आ गई।ऊपर देखी तो भैया सिर्फ अंडरवियर में नीचे की तरफ देख रहे थे और उनका लण्ड तो मानो कह रहा कि ये अंडरवियर भी निकालो;मुझे घुटन हो रही है। फिर मैं जोर से हँसते हुए लुँगी उठा के पेड़ पर रखते हुए पूछी,"क्या हुआ भैया?"
"ओफ्फ। मेरी लुँगी खुल के गिर गई।"
"कोई बात नहीं भैया। वैसे यहाँ कोई नहीं आने वाला जिससे आपको शर्म आएगी। अब जल्दी से पके आम नीचे करो।" मैं मुस्काती हुई बोली। मेरी बात सुन भैया भी मुस्कुरा दिए और आम तोड़ने लग गए। जल्द ही ढेर सारी आम जमा हो गई नीचे। कुछ ही देर में भैया भी नीचे आ गए। तुरंत ही मेरी नजर भैया के लण्ड की तरफ घूम गई।
अरे! ये तो अभी भी खड़ा ही है। इतनी देर तक ध्यान बँटे रहने के बावजूद भी ठुमके लगा रहा था। फिर मैं दो पके हुए आम लिए और एक भैया को देते हुए खाने बोली। भैया भी अब शर्म नहीं कर रहे थे। आम लेते हुए वहीं पास में एक झुकी हुई टहनी के सहारे खड़े हो खाने लगे। मैं भी उनके बगल में खड़ी हो खाने लगी। आम खत्म होते ही भैया आगे बढ़े और दो आम और उठा लिए।
जैसे ही उन्होंने मुँह लगाया जोर से थू-थू करते हुए चीख पड़े। मेरी तो जोर से हँसी निकल पड़ी क्योंकि मेरी वाली खट्टे नहीं थे।
"सीता, तुम्हारे आम कितने मीठे थे और ये....." भैया मेरी तरफ देखते हुए बोले। भैया की द्विअर्थी शब्द सुन मैं कुटीली मुस्कान देते हुए बोली,"अच्छा......"
भैया मेरी इस अदा देखते हुए शायद कुछ याद करने की कोशिश करने लगे। अचानक वे बिल्कुल झेँप से गए और सिर झुका लिए। शायद उन्हें अपनी गलती का आभास हो गया था कि वे क्या बोल दिए।
तभी मैं आगे बढ़ी और भैया के काफी करीब जाकर खड़ी हो गई। फिर हाथ वाली आम अपने दोनों आम के बीचोँ बीच लाते हुए हल्के से बोली,"जब मेरे आम इतने मीठे हैं तो खाते क्यों नहीं?"
इतना सुनते ही भैया की नजरें ऊपर उठ गई और अचरज से मेरी तरफ देखने लगे। मैं मुस्कुराते हुए अपनी एक आँखें दबा दी।
तभी भैया मुझे अपनी बाँहों में जोर से भीँचते हुए जकड़ लिए। मेरी दोनों आमों के बीच ये आम भी फँस गई थी। मैं तो सिर्फ गले लगने से ही पानी छोड़ने लगी थी। तभी भैया मेरे चेहरे को पकड़ते हुए अपने गर्म होंठ मेरी होंठ पर रख दिए। मैं तो आकाश में उड़ने लग गई थी। मेरे हाथ भैया को पीछे से जकड़ ली थी। भैया भी मुझे कसते हुए होंठों का रसपान करने लगे। हम दोनों की पकड़ इतनी गहरी हो गई थी कि बीच में फँसी आम भी अपनी पानी छोड़ने लगी थी और मेरी चोली को गीली करने लगी। पर मैं बेफिक्र हो भैया के होंठ का स्वाद चख रही थी। कुछ ही पल में भैया की जीभ मेरी जीभ से टकराने लगी। मैं अब पूरी तरह से मचल रही थी।तभी भैया मुझे घुमाते हुए टहनी के सहारे झुका दिए और अपना लण्ड मेरी चूत पर टिकाते हुए ताबड़तोड़ किस करने लगे। कभी होंठ पर,कभी गाल पर,कभी गर्दन पर,कभी चुची की उभारोँ पर। इतनी तेजी से चुम्मी ले रहे थे कि कहना मुश्किल था कब कहाँ पर चूम रहे हैं।
मेरी हालत अब पस्त होने लगी थी। मेरे पाँवोँ की ताकत बिलकुल खत्म हो गई थी। मेरी सफेद चोली पीले रंग में बदल गई थी और भैया जीभ से पीलेपन दूर करने की कोशिश कर रहे थे।
अचानक मैं तेजी से उठते हुए भैया से लिपटती हुई चीख पड़ी। मेरी चूत से मानो लावा फूट पड़ी। मैं सुबकते हुए पानी छोड़ रही थी।
तभी एक और ज्वालामुखी फूटी और भैया भी "आहहहहह सीता" कहते हुए झटके खाने लगे। उनका तोप अंडरवियर में अपने अँगारेँ बरसाने लगी। हम दोनों झड़ चुके थे।
कुछ देर तक यूँ ही हम दोनों चिपके रहे। फिर भैया मेरी चूतड़ पर पकड़ बनाते हुए नीचे जमीन पर लिटा दिए। मैं अपनी आँखें बंद किए चेहरे पर मुस्कान लाते हुए लेट गई। फिर भैया भी मेरे ऊपर लेटते हुए मेरे होंठ को चूमने लगे। कुछ ही देर में मैं गर्म होने लगी थी। अचानक से भैया मेरी चोली खोलने लगे और कुछ ही देर में मेरी चुची भैया के सामने नंगी थी। गोरी-2 चुची देखते ही भैया के मुँह से लार टपकने लगी। अगले ही पल भैया अपना आपा खोते हुए अपने दाँत गड़ा दिए। मैं जोर से चीख पड़ी जिसकी गूँज बगीचे में काफी देर तक सुनाई देती रही। भैया अब एक हाथ से मेरी चुची की मसल रहे थे और दूसरी हाथ से मेरी चुची ऐंठते हुए चूसे जा रहे थे।
कुछ ही देर भैया का एक बार फिर से अपने शबाब पर था और मेरी चूत में ठोकरे लगा रहा था। जिससे मेरी चूत में छोटी नदी बहने लगी थी। मैं अब कसमसाने लगी और खुद पर नियंत्रण खोने लगी थी।
अगले ही क्षण मैं सिसकते हुए बोली,"आहहहहहह भैया, नीचे कुछ हो रही है। जल्दी कुछ करो। ओफ्फ ओह!" भैया अभी भी और तड़पाने के मूड में थे। वे नीचे की ओर चूमते हुए खिसकने लगे। जैसे ही उनकी जीभ मेरी नाभी में नाची, मैं पीठ उचकाते हुए तड़प उठी। भैया लगातार मेरी नाभी को जीभ से कुरेदने में लग गए। मेरे दोनों हाथ भैया के बालों को नोँचने लग गए थे और उन्हें हटाने की कोशिश कर रही थी। भैया भी अब पूरे रंग में आ गई थी। भैया के इस रूप को देख मैं हैरान रह गई कि सब दिन गाँव में रहने वाले सेक्स को इतने अच्छे से कैसे खेल रहे हैं।

तभी भैया उठे और मेरे पैरों की तरफ हाथ बढ़ाते हुए मेरी लहँगा को ऊपर करने लगे। कुछ ही पल में पूरी लहँगा मेरे पेट को ढँक चुकी थी और नीचे सिर्फ पेन्टी मेरी चूत की रखवाली कर रही थी। मैं इतनी देर से तो बेशर्म बन रही थी पर अब तो शर्म से मरने लगी थी और अपने हाथों से मुँह को ढँक ली थी। भैया पेन्टी के ऊपर से ही चूत पर उँगली नचाने लगे और अचानक उँगली फँसाते हुए एक जोरदार झटके दे दिए। मेरी भीँगी हुई पेन्टी चरचराती हुई कई टुकड़े में बँट गई। भैया की नजर मेरी चूत पर पड़ते ही बोल पड़े,"ओफ्फ। क्या संगमरमर सी चूत है सीता तुम्हारी। कसम से अगर पहले जानता तो मैं कब का चोद चुका रहता।" और अपने होंठ मेरी गीली चूत में भिड़ा दिए। मैं कुछ बोलना चाहती थी पर भैया के होंठ लगते ही मेरी आवाज एक आहहहह में बदल के गूँजने लगी। भैया मेरी चूत को ऐसे चुसने लगे कि मानो वो मेरी चूत नहीं, मेरी होंठ हो। मैं उल्टे हाथ से जमीन की घास नोँच नोँच के फेंकने लगी थी। अचानक मैं चिहुँक उठी। भैया मेरी चूत के दाने को अपने दाँतो से पकड़ काट रहे थे। मेरी शरीर में खून की जगह पानी दौड़ने लगी थी। मैं लगातार चीखी जा रही थी। भैया बेरहम बनते हुए मुझे तड़पाने लगे। मैं ज्यादा देर तक टिक नहीं पाई और शरीर को जमीन पर रगड़ते हुए फव्वारे छोड़ने लगी। भैया बिना मुँह हटाए मेरी चूतरस तेजी से पीने लग गए। मैं भी लगातार भैया को अपनी रस सीधे गले में उतार रही थी। कुछ ही पल में भैया सारा रस चट कर गए थे। सारा रस चुसने के बाद भी भैया मेरी चूत को छोड़ने के मूड में नहीं थे। वे अब अपनी जीभ डालकर कुरेदने लगे। मैं झड़ने के बाद थोड़ी सुस्त पड़ गई थी। पर भैया की जीभ से मैं तुरंत ही अपने रंग में रंग गई और मचलने लगी। खुरदरे जीभ को ज्यादा देर तक सहन नहीं कर सकी। मैं तड़पते हुए भैया के बाल पकड़ते हुए बोली,"आहहहहहह भैया, अब मत तरसाओ। जल्दी कुछ करो वर्ना मैं मर जाऊंगी। ओफ्फ......"
भैया होंठ हटाते हुए मेरी तरफ देखने लगे। मैं लगभग रुआंसी सी हो गई थी। भैया भी सोचे कि लगता है कि चूल्हा अब पूरी तरह से गर्म है, अब जल्दी ही भुट्टे सेंक लेना चाहिए। वे उठे और आगे बढ़ते हुए अपना 8 इंची लण्ड मेरी होंठ से सटाते हुए बोले,"जान, अब थोड़ा इसकी भी सेवा कर दो।"
मैं तो जल्द से जल्द चुदना चाहती थी। बिना कुछ कहे मैं गप्प से लण्ड को अपने होंठों में फँसा ली। भैया के मुख से एक जोर से सिसकारि निकल गई। उनके अंडोँ को पकड़े अपने होंठ आगे पीछे करने लगी। पूरे बगीचे में अब भैया की आवाजें गूँजने लगी थी। कुछ ही देर में मेरी रसीली होंठ अपने जलवे दिखा दी। भैया तड़पते हुए मेरी बाल पकड़े और अपने लण्ड को पीछे कर लिए। मेरी एक छोटी आह निकल गई। फिर मैं अपने होंठों पर जीभ फिराते हुए नशीली आँखों से देखने लगी। भैया नीचे झुकते हुए मेरी होंठों को चूमे और बोले,"अब दिलाता हूँ असली मजा।" और नीचे मेरी दोनों पैरों को ऊपर करते हुए बीच में आ गए। फिर झुकते हुए अपने लंड को मेरी चूत पर घिसने लगे। मेरी नाजुक चूत भैया के गर्म लोहे को सह नहीं पाई और पानी छोड़ने लगी। दो बार झड़ने के बाद भी मेरी वासना की तुरंत ही भड़क गई। मैं अपनी गांड़ ऊपर करती हुई लण्ड को अपने चूत में लेने की कोशिश करने लगी। अचानक ही मेरी चूत पर एक जोरदार हमले हुए। मैं जोर से चीखते हुए तड़पने लगी।
"आहह.ह.ह.ह..भैयाआआआआआआआ. मर गईईईईईईईईईईईई"
जोर मुझे अपनी मजबूत बाँहो से जकड़े थे।मैं चाह कर भी खुद को छुड़ा नहीं सकती थी। तभी मैं अपनी चूत की नजर घुमाई तो होश उड़ गई मेरी। भैया का 8 इंची लंड जड़ तक चूत में उतर चुकी थी। मेरी चूत में काफी दर्द हो रही थी।
तभी भैया मेरे कानों को चूमते हुए पूछे,"सीता,ज्यादा दर्द हो रहा है क्या?"
मैं रोनी सूरत बनाते हुए हाँ में सिर हिला दी।
"लगता है शाले श्याम 5 इंच का लंड लिए घूम रहा है। अगर पहले पता होता तो कतई नहीं तुम्हें चुदने के लिए उसके पास जाने देता।"
भैया की बातें सुनते ही मैं दर्द को भूलते जोर से हँस पड़ी। भैया को लगा कि मेरी दर्द कम हो गई है तो अपना लंड पीछे खींचते हुए धक्का लगा दिए। मैं आउच्च्च्च्च्च करते हुए उछल पड़ी।
"जानू, असली लंड से चुदने पर थोड़ा दर्द तो सहना ही पड़ेगा।" और मुस्कुरा दिए।
"भैया, उनका भी असली ही था पर आपसे थोड़ा छोटा था।"कहते हुए मैं मुस्कुराते हुए अपनी नजर घुमा दी।
"हाहाहा..अच्छा..!" कहते हुए भैया मेरी चुची मसलते हुए चुसने लगे। अपने लंड की तारीफ सुन और गर्मजोशी से चुसने लग गए थे।कुछ ही देर में मैं दर्द से मुक्त हो अपनी चूत ऊपर की तरफ धकेलने लगी। ये देखते ही भैया मुँह मेरी चुची से हटा लिए। और फिर अपना लंड खींचते हुए अंदर कर दिए और आगे पीछे करने लगे। मेरी चीख अब सेक्सी आवाजें में बदल गई थी। भैया अपने हर धक्के पर याहहहहहह करते और साथ में मैं भी आहहहहह करती हुई उनका साथ दे रही थी।
कुछ ही देर में भैया किसी मशीन के पिस्टन की तेजी से चोदने लगे। खुले में चुदने के मजे मैं पूरी तरह से ले रही थी। भैया पूरे रफ्तार से मेरी चूत की धज्जियाँ उड़ा रहे थे।
कोई 15 मिनट तक लगातार पेलने के बाद भैया चीखते बोले,"आहहहह सीता! मेरी प्यारी बहन, मैं आने वाला हूँऊँऊँऊँ.. अंदर ही डाल दूँ?"
"हाँ भैयायायायाया... मैं भी आने वाली हूँ। अपना सारा पानी अंदर ही डाल दो।"मैं भी लगभग चीखते हुए बोली।
तभी भैया का पूरा शरीर अकड़ते हुए झटके खाने लगा और नीचे मैं भी अकड़ने लगी। भैया अपने लंड से अपनी बहन की गहरी चूत को नहला रहे थे। एक दूसरे को इतनी जोर से जकड़े हुए थे कि मेरी नाखून उनकी पीठ को नोँच रही थी। भैया के दाँत मेरी चुची में गड़ गई थी। काफी देर तक झटके खाने के बाद हम दोनों शांत यूँ ही एक दूसरे के शरीर पर चिपके थे। मैं मस्ती में अपनी आँखें बंद किए खो सी गई थी। फिर भैया मुझ पर से हटते हुए बगल में हाँफते हुए लुढक गए।

कुछ देर बाद जब होश में आई तो उठ के बैठ गई और अपनी हालत देख मैं मुस्कुराने लगी। पूरी चोली आम के रस और भैया के थूक से सनी हुई थी। और लहँगा तो पूरी मिट्टी से भरी हुई थी। पास ही मेरी पेन्टी फटी पड़ी थी। इस वक्त अगर कोई देख ले उसे समझते देर नहीं लगेगी कि अभी-2 दमदार चुदाई हुई है। बगल में नजर दौड़ाई तो देखी भैया बेसुध से अभी भी पड़े हुए थे मानो लम्बी रेस दौड़ के आए हों। उनका लंड अभी भी मेरी चूत की रस से सनी हुई थी। मैं मुस्कुराते हुए फटी हुई पेन्टी उठाई और आहिस्ते से उनका लंड साफ करने लग गई। लंड पर हाथ पड़ते ही भैया आँखें खोल दिए और मुस्कुराने लगे। जवाब में मैं भी शर्मिली हँसी हँसते हुए बोली,"अब उठो भी भैया! जल्दी घर चलो वर्ना ज्यादा देर हुई तो भाभी मुफ्त में डांटेगी।"
"ऐसी माल के बदले अगर कोई 100 डंडे भी मारे तो मैं मार खाना मंजूर करूँगा मेरी रानी। मुआहहह" भैया उठ के बैठते हुए बोले।
मैं उनकी बात सुन हँसते हुए बोली,"ठीक है,ठीक है। अब बातें बनाना कम करो और जल्दी से कपड़े ठीक करो; और जल्दी चलो।" भैया हँसते हुए अपने कपड़े ठीक किए और सारे आम थैली में डाल बाईक पर लाद दिए। फिर मैं भी चुन्नी निकाल शॉल की तरह ओढ ली और बाईक पर भैया से चिपकते हुए बैठ घर की तरफ चल दी।
घर आते ही मैं तेजी से अपने रूम में गई और कपड़े लेकर बाथरुम में घुस गई। करीब 1 घंटे बाद फ्रेश हो बाथरुम से निकली तो भाभी हमें देख मंद-2 मुस्कुरा रही थी। मैं भी धीरे से मुस्कुरा कर भाभी की मुस्कान को समझने की कोशिश करते हुए अपने रूम की तरफ बढ़ गई।
रूम में आते ही फोन की याद आ गई जो कि मैं यहीं भूल गई थी। मेरे दिमाग में भाभी की हँसी बिजली की तरह कौँध गई। कहीं अंकल या पूजा कमीनी पूजा कुछ भाभी से बोल तो नहीं दी। मैं तेजी से अपने पर्स में से फोन निकली। देखी तो फोन में 15 Missed Call पूजा की थी और 1 Message अंकल की थी।
मन ही मन भगवान को थैंक्स दी कि भाभी ने फोन Recieved नहीं की थी। मैंने अंकल के संदेश को खोल के पढ़ने लगी। थैंक्स गॉड! अंकल को विधायक की टिकट मिल गई और अंकल ने उसी की बधाई संदेश भेजे थे। मुझे तो खुशी पे खुशी मिली जा रही थी। मैंने भी जल्दी से बधाई संदेश लिखी और अंकल को भेज दिए।
फिर मैं पूजा को Call Back की। फोन उठाते ही पूजा के सुंदर होंठों ने गाली की तो बारिश कर दी। मैंने हँसते हुए फोन भूल जाने की बात काफी कोशिश के बाद बता पाई, क्योंकि वो बिना कुछ सुने गाली दिए जा रही थी। फिर पूजा शांत होते हुए बोली," भाभी, आपकी बहुत याद आ रही है। जब तक बाहर रहती तो ठीक रहती है, जैसे ही घर आती हूँ तो आपकी यादें बहुत सताने लगती है।"
पूजा एक प्रेमी की तरह बोले जा रही थी। मेरी तो हँसी निकल रही थी पर सच कहूँ तो मैं भी पूजा से मिलने के लिए तड़प रही थी।
"भाभी, इस रविवार को भैया को किसी तरह आपको लाने भेजूँगी। प्लीज आप आ जाना।" पूजा अपनी छोटी सी योजना हमें समझाते हुए बोली।
मैं भी तुरंत हाँ कह दी और पूछी,"पूजा, अंकल से पार्टी मिली या नहीं। आज तो उन्हें टिकट मिल गई है।"
"अरे भाभी, जिस काम में पूजा अपनी टांगेँ अड़ा देगी, वो काम भला कौन रोक सकता। अंकल अगर पहले मेरी हेल्प लेते तो इतनी बाधा नहीं आती उन्हें।"पूजा चहकते हुए अपनी जीत का बखान करने लगी। मैं तो पूजा की बातें सुन चौंक ही पड़ी।
"मतलब......?" मैं इसे और जानने के ख्याल से सिर्फ यही पूछ सकी।
"मेरी सीता डॉर्लिँग, पहले आप पटना तो फिर सारी कहानी बताती हूँ। अभी तो बस इतनी जान लो कि कल पूरी रात अंकल के पार्टी अध्यक्ष समेत 3 मर्द मेरी धज्जियाँ उड़ाते रहे। और अगली सुबह अंकल को टिकट मिल गई।" और कहते हुए पूजा हँस दी।
"क्या...?"पूजा की संक्षेप में कही बातें सुन मेरी मुँह से सिर्फ इतनी ही निकल पड़ी। तभी पूजा तेजी से कुछ बोलती हुई फोन रख दी जो कि ठीक से सुन नहीं पाई। मैं तो पूजा की हुई 3 मर्द के साथ चुदाई में खो सी गई। कैसे छोटी सी पूजा उनका लंड अपने छोटी सी चूत में रात भर ली होगी। दिल में पूजा द्वारा की पूरी रात चुदाई की कहानी छपने लगी थी। इन्हीं लाइव चलचित्र को देखते और भैया द्वारा दी गई दर्द से कब मेरी आँख लग गई, पता नहीं।
शाम के 5 बजे मेरी आँख खुली, जब भाभी मुझे उठाई। मैं उठते हुए भाभी की तरफ देखते हुए मुस्कुरा दी। तभी भाभी बोली,"लगता है हमारी रानी सपने में अपने राजा जी के संग धूम मचा रही थी।"
मैं भाभी की मजाक से हँसते हुए बेड से नीचे उतर खड़ी हुई कि मैं आह करते हुए गिरते-2 बची। मेरी चूत में अब काफी दर्द महसूस हो रही थी। भाभी भी तुरंत ही मेरी बाँहेँ पकड़ ली।
ये कैसी चुदाई थी, मजे पहले ले लो और दर्द 4 घंटे बाद। मैं तो भैया की इस अदा की कायल हो गई और मुस्कुरा दी। तभी भाभी मेरी गालोँ पर हाथ फेरते हुए बोली,"क्या बात है? राजा जी पटना में हैं तो ये दर्द किस महाशय ने दिए।"
"भाभी,आप तो हर वक्त मजाक ही करते रहते हैं।" मैं शर्माते हुए मन में भैया को याद करते झूठ बोल दी। "मजाक मैं नहीं आप कर रही हैं। जल्दी से आप बताओगी या फिर मैं उसका नाम बोलूँ।" भाभी एक बार फिर जोर देते हुए पूछी।
"कोई नहीं भाभी। वो बगीचे में गिर गई थी जिससे चोट आ गई है।" मैं किसी तरह भाभी को मनाने की कोशिश करने लगी।
तभी भाभी बोली," सीता, हर दर्द को अच्छी तरह से पहचानती हूँ। अब सीधे से नाम बोलो वर्ना मैं बोल दूंगी।" और भाभी मुस्कुरा के देखने लगी।
मैं बार बार भाभी की ऐसी धमकी से जोश में आते हुए बोली,"अब आप जानती है उसका नाम तो जरा मैं भी तो सुन लूँ कि कौन है आपकी नजरों में जो मेरी ये हालत कर सकता है।"
भाभी अपने होंठों पर शरारती मुस्कान लाते हुए मुझसे सटते हुए कान में धीरे से बोली," इस पूरे गाँव में ऐसा दर्द मेरे पति यानी आपके भैया के सिवाय कोई नहीं दे सकता।"
मैं तो सन्न रह गई। मेरे हाथ पाँव कांपने लगे और बूत सी बनी खड़ी थी। कुछ ही पल में मेरी आँखों से आँसू छलक पड़ी।

भाभी मुझे रोते देख अपने सीने से चिपकाती हुई बोली,"सीता, मेरी जगह तुम क्यों रो रही हो। रोना तो मुझे चाहिए था कि मेरे पति बाहर भी मुँह मारते फिरते हैं। चलो चुप हो जाओ।"
भाभी की प्यार और दर्द भरी बातें सुन मैंने सुबकते हुए बोली,"सॉरी भाभी, हमसे गलती हो गई। आप नाराज मत होना। पता नहीं कैसे मैं बहक गई। प्लीज आज माफ कर दो, आगे से कभी सोचूँगी भी नहीं।" मैं खुद को काफी गिरी हुई समझने लगी थी। काफी अफसोस हो रही थी कि ऐसी गंदी हरकत क्यों की मैंने। अपने ही परिवार में सेंध लगा बैठी। ऐसे में एक हँसता हुए जिंदगी पल भर में तबाह हो सकती है।
"अरे पगली, मैं नाराज कहाँ हूँ। हाँ नाराज जरूर होती अगर तुम्हारी जगह कोई और होती। मैं अपने प्यारी सी ननद को एक खुशी भी नहीं दे सकती क्या?"
भाभी की बात सुनते ही मैं सीधी होती एकटक भाभी को निहारे जा रही थी। पता नहीं क्यों, भाभी के चेहरे में मुझे भगवान दिखने लगी थी। भाभी अपनी तरफ मेरी नजर देख बोली,"अब क्या हुआ? कसम से कह रही हूँ मैं तनिक भी नाराज नहीं हूँ।"
भाभी की बात सुनते ही मैं एक बार फिर ठुनकती हुई उनके सीने पर सिर रख दी। भाभी जोरों से हँस पड़ी और बोली,"अब नाटक बंद करो और चलो गर्म पानी रखी है बाथरुम में। जल्दी से नहा लो,दर्द कम हो जाएगा।"
ओफ्फ!एक और वार... जब आई थी तो मैं ठीक ही थी; फिर भाभी को कैसे पता मैं चुद के आई हूँ। और भाभी पहले से गर्म पानी कर रखी है। मैं पुनः गहरी सोच में पड़ गई। तभी भाभी मेरी हालत देख मुस्करा दी और बोली,"ज्यादा मत सोचो सीता। जब तुम लोग बगीचे से आई थी, तब मैं सच में तुम्हें देखी भी नहीं थी। लेकिन तुम्हारे भैया मुझसे इस तरह की कोई भी बात नहीं छिपाते। समझी! चलो अब।" और भाभी मुझे खींचते हुए बाथरुम की तरफ चल पड़ी। मेरे कदम तो मानो जमीन से जुड़ गई थी। भाभी को निहारते हुए जबरदस्ती आगे बढ़ी जा रही थी।
बाथरुम में ले जाकर भाभी जल्दी फ्रेश हो निकलने कह बाहर निकल गई। मैं बूत सी बनी यूँ ही करीब आधे घंटे तक बैठी रही। इन आधे घंटे में ना जाने कितने सवाल खुद से पूछ चुकी थी, याद नहीं।
तभी भाभी की आवाज फिर सुनाई दी तो मैं ख्वाबोँ से जगी और जल्दी से आती हूँ कह फ्रेश होने लगी।
फ्रेश होने के बाद देखी भाभी किचन के काम में लग गई थी। मैं भी भाभी के साथ उनके काम में हाथ बँटाने लगी। तभी बाहर बाईक की आवाज आई,शायद भैया आ गए थे। आते ही भैया मुझसे बोले,"सीता, तुम फोन रिसीव क्यों नहीं करती। मेहमान कितनी देर से तुम्हें ट्राई कर रहे हैं।" ओफ्फ ! मैं आज बार- फोन ही भूल जाती हूँ। मैं तेजी से निकल अपने रूम फोन लेने के निकल पड़ी।
गई छूटी कॉलेँ थी श्याम की, मैंने तुरंत ही कॉल-बैक की। फोन रिसीव करते ही श्याम बोल पड़े,"मैं परसों आ रहा हूँ तुम्हें लेने,तैयार रहना। भैया जी को भी बोल दिया हूँ।"
मैं मन ही मन काफी दुःखी हुई क्योंकि अभी तो भैया के साथ ठीक से मजे भी ले नहीं पाई थी। मैं मना तो नहीं कर सकती पर बुझे मन से पूछी,"इतनी जल्दी...?"
"हाँ डॉर्लिँग, अकेले अब रहना बिल्कुल कठिन लग रहा है। और पूजा भी जिद कर रही है कि भाभी को जल्दी लाओ वर्ना मैं भी गाँव चली जाऊंगी। सो प्लीज..." श्याम एक ही सुर में कह डाले।
मैं पूजा का नाम सुनते ही खिल सी गई। फिर मैं भी तुरंत सोच ली कि इन 2 दिन में ही भैया से थोड़ी ही सही मजे ले लुँगी, आगे अगली बार देखी जाएगी। और फिर श्याम को "ठीक है।"कह कुछ प्यार भरी बातें की और फोन रख दी।
रात के करीब 9 बज रहे थे। भैया खाना खा चुके थे। मैं और भाभी भी साथ में खाना खाई। फिर मैं अपने रूम की तरफ बढ़ी थी कि पीछे से भाभी हाथ पकड़ते हुए रोक ली। मैं रुकते हुए भाभी की तरफ नजरों से ही क्यों पूछ बैठी। भाभी बोली,"सीता, मैं तो चाहती थी कि आज रात तुम दोनों एक साथ सो जाओ क्योंकि परसों तुम चली जाएगी। लेकिन अगर मैं ऐसा की तो तुम अगली 3 दिन तक चल भी नहीं पाएगी। सो प्लीज बुरा मत मानना।"
मैं चुपचाप भाभी की बात सुन रही थी। आगे भाभी बोली,"मैं नहीं चाहती कि मेरी प्यारी ननद किसी परेशानी में पड़े। पर हाँ, कल रात मैं नहीं छोड़ने वाली क्योंकि आपके भैया कल सुबह मार्केट से दवा लाने जाएँगे जिससे चुदने के बाद 24 घंटे तक तेज दर्द नहीं होती। मैं भी पहले वो दवा खाती थी, पर अब जरूरत नहीं पड़ती।"
भाभी की पूरी बात सुनते ही मैं मुस्कुराती हुई हाँ में सिर हिला दी।
"ठीक है अब जाओ आराम करो। कल अपने भैया का असली रूप देख लेना कि कैसे और किस तरह बेरहमी से करते हैं।" कहती हुई भाभी हँस पड़ी। मैं भी शर्मा के मुस्कुरा दी और वापस अपने रूम की तरफ चल दी। तभी पता नहीं मुझे क्या सुझी। मैं पीछे से बोली,"भाभी, आज पूरी मत खाना। मेरे वास्ते कल के लिए थोड़ी सी छोड़ देना।"
भाभी सुनते ही हँसती हुई "ठीक है।"कहती हुई चली गई।
रूम में आते ही मैंने अपने सारे कपड़े खोल फेंक पूरी नंगी हो गई। भाभी के मुख से अपने और भैया के बारे में बातें सुन के ही मैं गर्म हो गई थी। मैं बेड पर लेट गई। मैं हाथों से मस्ती में चुची मसलने लगी। मस्ती जब चढ़ने लगी तो मैं अपनी हाथ नीचे ले जाकर चूत पर ज्यों ही रखी, मैं दर्द से चीखते-2 बची। ओफ्फ! अभी भी इतनी तेज दर्द। कैसे शांत करूँ अब इसे। भाभी सच ही कहती थी अगर आज मैं और चुदती तो 3 नहीं 6 दिन तक बेड पर ही पड़ी रहती मैं। फिर तेजी से दिमाग चलाती जल्द ही उपाय खोज ली। श्रृंगार-बॉक्स से ठंडी क्रीम निकाली और पूरी उँगली पर लेप ली। ठंडक की वजह से कुछ तो दर्द कम महसूस होगी। और फिर बेड पर लेट चूत पर उँगली चला कर झड़ने की कोशिश करने लगी। मैं दर्द से कुलबुला रही थी पर किसी तरह उँगली चलाती रही ताकि झड़ सकूँ।
करीब 10 मिनट तक करने के बाद मैं अकड़ने लगी और अगले ही क्षण मेरी चूत पानी छोड़ने लगी। झड़ते हुए मुझे इतनी सुकून मिली कि मैं तुरंत ही नींद के आगोश में चली गई और नंगी ही सो गई।

अगली सुबह मेरी नींद देर से खुली। अंग-अंग टूट रही थी। कल वाली चुदाई की खुमारी अब जा के दूर हुई थी। तभी नजर मेरी नंगी शरीर पर पड़ी पतली सी सफेद चादर पर गई। ओह गॉड! पूरी रात मैं नंगी ही सो रही थी। फिर दिमाग पर जोर देते हुए रात का वाक्या याद करने लगी। रात में झड़ने के बाद तो नंगी ही सो गई थी फिर ये चादर किसने डाल दी। जरूर भाभी आई होगी जगाने। फिर मुझे नंगी ही गहरी नींद में सोती देख चादर डाल दी होगी। मेरे होंठ पर अनायास ही मुस्कान की तरंगेँ रेँगने लगी और मेरी आँखें चादर को देखने लगी।
एक दम पतली सी सूती कपड़ों की थी जिसमें आसानी से आर-पार देखी जा सकती थी। नरम होने के कारण मेरी शरीर से इतनी चिपकी थी कि मानो वो चादर नहीं मेरी त्वचा ही है। मेरी शरीर की हर एक ढाँचा उभर कर दिखाई दे रही थी। मैं अपनी ही शरीर की बनावट देख खो सी गई। कुछ देर बाद मैं उठी और फ्रेश होने के लिए कपड़े ढूँढने लगी। अचानक मेरी शैतानी जाग गई और मन ही मन मुस्काती हुई उसी चादर को ओढते हुए बाथरुम की तरफ चल दी। चादर मेरी जांघ तक ही पहुँच पा रही थी। और जांघ तक ढँकी भी थी तो बस नाम की। मेरी हर अमानत चादर के बाहर बिल्कुल साफ-2 दिखाई पड़ रही थी।
मैं अपने पायल और चूड़ी खनकाती हुई मटक-2 के जा रही थी। अचानक मेरी नजर आँगन के दूसरी तरफ भैया पर नजर गई। भैया नाश्ता कर रहे थे,उनकी नजर मुझ पर पड़ते ही कौर के लिए खोली गई मुँह,खुली ही रह गई। हालाँकि भैया मेरी चूत बजा चुके थे,लेकिन मर्द अगर अपनी पत्नी को ही नए रूप में देख ले तो उसका अंग अंग वासना से तुरंत ही भर जाता है; वैसी ही हालत भैया की इस वक्त थी। मैं तिरछी नजरों से देखते हुए मंद-मंद मुस्कुराती चलती हुई बाथरुम में घुस गई। अंदर मैं इत्मिनान से फ्रेश हुई और अच्छी तरह रगड़ रगड़ कर साथ ही नहा ली।चूत की दर्द अब नहीं के बराबर थी। नहाने के बाद मैं भैया को फिर तड़पाने के ख्याल से मुस्कुराती हुई चादर चुची के उभारोँ पर बाँध ली। चादर शरीर पर पड़ते ही पूरी गीली हो गई। बाहर निकलते ही मैं भैया की तरफ नजर दौड़ाई। ओह , मेरी मंशा पर पूरी तरह पानी फिर गई। ज्यादा देर लगा दी मैंने जिससे भैया मार्केट निकल चुके थे। मन मसोस कर मैं अपने रूम की तरफ बढ़ने लगी। तभी किचन से भाभी की आवाज आई,"सीता, पहले चाय पी लो।बाद में कपड़े पहनना।"
मैं गेट के पास ठिठक के रुक गई। फिर होंठों पर हल्की मुस्कान लाते हुए मुड़ते हुए किचन में आ गई। भाभी मुस्कुराते हुए चाय मेरी तरफ बढ़ा दी।

मैं कप ले चाय पीने लगी। तभी भाभी बोली,"ऐसे तो और भी सुंदर लग रही हो।"
मैं मुस्कुरा के भाभी को थैंक्स बोली। फिर भाभी हँसती हुई बोली,"पता है तुम्हें देखते ही उनका लंड तन के कुतुबमीनार बन गई थी।" मैं भी हँस पड़ी और पूछी,"मार्केट चले गए क्या?"
"हाँ, और जल्द ही आने की कोशिश करेंगे। वैसे एक बार तो चुस के शांत कर दी पर वो तुम्हें याद कर तुरंत ही फिर खड़ा हो गया और उन्हें अपने खड़े लंड में ही जाना पड़ा।" भाभी कहते-2 जोर से हँस दी। मैं भी उनके साथ हँस पड़ी।
"चाय कैसी बनी आज?"भाभी पूछी।
मैं भाभी के ऐसे प्रश्न सुन भौँहेँ सिकुराती हुई बोली,"अच्छी तो है। आपसे कभी किचन में गलती हुई है जो आज पूछ रही हैं।"
"आज चाय में कुछ Extra चीजें डाल दी इसीलिए पूछी।" भाभी होंठों पर कुटील मुस्कान लाती हुई बोली।
मैं एक फिर एक घूँट पी स्वाद मालूम करने की कोशिश की पर नाकाम रही। फिर अपनी भौँहेँ उचका के पूछी,"क्या डाली हो?"
भाभी हँसते हुए बोली,"आज चाय में दूध-शक्कर के साथ उनके लंड का पानी मिलाई हूँ।"और खिलखिला के हँस दी। मैं तो गुस्से से कांप रही थी। फिर बेसिन की तरफ बढ़ते हुए बोली,"रण्डी कहीं की। तुझे और कुछ नहीं सूझती क्या?"
तभी भाभी मुझे पीछे से पकड़ती हुई बोली,"प्लीज सीता, फेंकना मत। मेरी गला अभी भी दर्द कर रही है। इतनी बेरहमी से डाले थे कि पूछो मत। मेरी इस दर्द को यूँ ही बेकार मत करो प्लीज।"
भाभी की याचना करती देख मैं ढीली पड़ गई और सारा गुस्सा रफ्फूचक्कर हो गई। फिर अपने होंठों पर मुस्कान लाई और पलटते हुए बोली,"ऐसी हरकत फिर कभी मत करना वर्ना मैं आपसे कभी नहीं बोलूँगी।"
भाभी हाँ कहती हुई मेरी उभारोँ को चूमते हुए थैंक्स बोल मेरी हाथ की कप को मेरे होंठों से लगा दी। मैं उनकी आँखों में झाँकती लंड के पानी वाली चाय पीने लगी। अब मैं चाय पीते हुए गर्म होने लगी थी। आखिर क्यों नहीं होती; अपने सगे भैया के लंड पानी की चाय भाभी जो पिला रही थी। मैं चाय खत्म की और भाभी को थैंक्स बोल अपने रूम में आ गई।
मैं कपड़े पहनी और भाभी को फ्रेश होने कह बाकी के बचे काम को निपटाने लगी। काम खत्म करने के बाद हम दोनों खाना खा आराम करने चली गई।
दोपहर के 3 बजे करीब मैं और भाभी साथ बैठी इधर-उधर की बातें कर रही थी कि तभी भाभी की फोन बजी। भाभी बात करने लगी। मैं ध्यान से सुन उनकी बातें सुनने लगी। कुछ ही पल में भाभी काफी मायूस सी हो गई। मैं भी कुछ परेशान हो गई भाभी को देख। फिर भाभी फोन रखते हुए बोली,"सीता, आज वो नहीं आएंगें!"
अब मायूस होने की बारी मेरी थी। मेरे सपने टूट कर बिखर रहे थे। कितनी चीजें सोच के रखी थी आज रात के लिए। फिर एक शब्दों में क्यों पूछी।
"वो मामाजी का देहांत हो गया है। वो घर आ रहे थे कि रास्ते में उन्हें फोन आया तो वहीं से लौटना पड़ गया। अब कल शाम तक आएंगें।"
भाभी की बात खत्म होते मैं गुस्से से मन ही मन खूब गाली देने लगी। जो व्यक्ति दुनिया छोड़ चले जाते हैं उन्हें अपशब्द कहना नहीं चाहिए, पर ये चीज मेरी चूत नहीं समझ रही थी तो मैं क्या करती। मैं बिल्कुल ही उदास हो गई थी। भाभी मेरे कंधों पर हाथ रख बोली,"कोई बात नहीं सीता। उदास मत हो अगली बार हम दोनों की ये इच्छा जरूर पूरी होगी।"
ये तो मैं भी जानती थी पर अगली बार मैं कब आऊंगी,खुद नहीं जानती थी। किसी तरह हम दोनों ने शाम में किचन का काम खत्म कर खाना खा सोने चली गई।  


अचानक श्याम मेरे शरीर को झकझोर कर जगाते हुए बोले,"ऐ सीता, उतरना नहीं है क्या?"
मैं हड़बड़ाते हुए जैसे नींद से जागी। ऑटो कब की रुक चुकी थी। मैं शर्मा गई और उतरते हुए एक नजर ड्राइवर की तरफ देखी। उसकी नजर मेरी चुची पर गड़ी भद्दी सी मुस्कान दे रहा था। मैं जल्दी से साड़ी ठीक करती उतर के खड़ी हो गई। हालाँकि मेरी साड़ी ठीक ही थी पर देखने वाले तो चंद मिनट में ही नंगी कर देते हैं।
ऑटो में बैठते ही मैं अपनी पुरानी यादों में इतनी खो गई कि मैं कब पहुँच गई मालूम ही नहीं पड़ी। श्याम उसे किराया देने के बाद सामान उठाते हुए अपने फ्लैट की ओर चल दिए। मैं भी उनके पीछे चल दी। गेट के पहुँचते ही मेरी नजर पता नहीं क्यों ऑटो-ड्राइवर की चली गई। वो अभी भी रुका भद्दी मुस्कान देते हुए अपना लंड मसल रहा था। मैं सकपकाती हुई तेजी से कदम बढ़ाती कैम्पस के अंदर चली आई। मन ही मन में उसे गाली भी दे रही थी।
कैम्पस उतनी बड़ी तो नहीं थी पर छोटी भी नहीं थी। जिसके चारों तरफ चारदिवारी थी। कैम्पस के गेट से फ्लैट तक पक्की पगडंडी बनी थी, जबकि दोनों तरफ घास लगी हुई थी। घास के बाद चारदिवारी से सटी चारों तरफ रंग बिरंगी अनेक तरह की फूल लगी थी। कुल मिलाकर कैम्पस काफी अच्छी तरह से सजी थी। मैं मुआयना करती चल रही थी। घर भी हम लोगों के लिए अच्छी खासी थी। 3 मंजिल के घर में मेरी फ्लैट पहली मंजिल पर थी। मैं सीढ़ी चढती अपने रूम तक पहुँच गई। श्याम गेट नॉक किए, कुछ देर बाद गेट खुली।
पूजा देखते ही चहक के हमें गले लगा ली। मैं भी हँसती हुई पूजा को अपनी बाँहों में भर ली। श्याम भी मुस्कुराते हुए अंदर सामान रख फ्रेश होने चले गए। पूजा मुझे खींचते हुए अपने रूम में ले गई और एक जोरदार किस के ख्याल से अपने होंठ मेरे होंठ पर चिपका दी। मैं भी एक भूखी की तरह चूमने लगी। जब काफी देर चुसने के बाद पूजा अलग हुई तो मैं पूछी,"क्या बात है, आजकल तो दिन ब दिन और निखरती जा रही है मेरी पूजा। अंकल का पानी कुछ ज्यादा ही असरदार लग रही है।"
"भाभी,जलो मत। अंकल का पानी जब अपने चूत में लेगी तो आप भी निखर जाओगी।" पूजा हँसती हुई बोली।
"चुप कर कमीनी। आपके भैया घर में ही हैं, कहीं सुन लिए तो खैर नहीं।" मैं डरती हुई धीमे आवाजोँ में बोली।
"ओह सॉरी। आपके आने की खुशी में सब कुछ भूल ही गई थी। अच्छा अब जल्दी से फ्रेश हो जाओ, मैं नाश्ता तैयार कर रही हूँ। फिर ढेर सारी बातें करेंगे।" पूजा भी सकपका के बोली।
तभी बाथरुम से श्याम निकल अपने रूम में चले गए। मैं भी बाथरुम में फ्रेश होने घुस गई।
फ्रेश होने के बाद हम सब साथ ही नाश्ता किए और कुछ देर आराम करने अपने रूम में चली गई।
शाम में करीब 5 बजे नींद खुली। श्याम भी तब जग चुके थे और शायद बाहर जाने के लिए कपड़े पहन रहे थे। तैयार होने के बाद बोले,"आ रहा हूँ कुछ देर में।" और निकल गए।
मैं भी उठी और मुँह हाथ धो पूजा के रूम की तरफ बढ़ गई। पूजा बैठी पढ़ रही थी। मैं दखल दिए बिना वापस जाने की सोची कि तभी पूजा की नजर मुझ पर पड़ गई। वो देखते ही बोली,"भाभी, आओ ना। मैं पढ़ते-2 थक गई हूँ, तो कुछ देर फ्री होने की सोच रही थी। पर भैया की वजह से जबरदस्ती पढ़ रही थी।"
मैं मुस्कुराते हुए रुक गई। फिर पूजा उठी और बोली,"चलो छत पर चलते हैं।"
मैं हामी भरती हुई पूजा के साथ चल दी। छत पर पहुँचते ही पूजा फोन निकाली और नम्बर डायल करने लगी। मैं बिना कुछ पूछे पूजा की तरफ देख रही थी। तभी उधर से आवाज आई,"हाय मेरी रण्डी, क्या हाल है।"
ये अंकल की आवाज थी जिसे मैं सुनते ही पहचान गई। पूजा मेरी तरफ देख एक आँख दबाती हुई बोली,"मैं तो ठीक हूँ,पर मेरी चूत की हालत कुछ ठीक नहीं है अंकल।"
सच पूजा की रण्डीपाना देख मेरी तो हँसी निकल गई।

पता नहीं क्यों अब मैं भी ऐसी गंदी बातों को काफी मजे से सुन रही थी।
"वो तो होना ही था। आखिर 3 मर्द रात भर तेरी चूत बजाए जो हैं। हा हा हा हा" अंकल कहते हुए हँस पड़े तो साथ में पूजा भी हँसती हुई बोली,"हाँ अगर मैं नहीं जाती तो आप वहीं गाँव में मुखिया बनके बड़े नेता से गांड़ मरवाते रहते।" पूजा की बात सौ फीसदी सच थी तभी तो अंकल भी तुरंत उसकी हाँ में हाँ मिला दिए।
"अच्छा,अभी आप कहाँ है? आपसे मिलने के लिए कोई यहाँ बेसब्री से इंतजार कर रही है।" पूजा बात को सीधे प्वाइँट पर लाती हुई बोली।
पूजा यही बताने के लिए तो फोन की थी। अंकल खुशी से चहकते हुए बोले,"क्या, सीता आ गई है?"
"हाँ..."
"ओह मेरी रानी। ये साला चुनाव सिर पर चढ़ा है सो मूड खराब कर रखा है। अच्छा एक-दो दिन में मैं किसी तरह समय निकाल आ जाऊँगा। अच्छा पूजा, उसकी चूत कब दिलवा रही हो। मैं काफी उतावला हो रहा हूँ।" अंकल एक ही सुर में सवाल जवाब सब कर गए। अंकल की बातें सुन इधर मेरी चूत तो पानी भी छोड़ने लग गई थी।
पूजा हँसते हुए बोली,"मिल जाएगी अंकल, बस एक-दो बार और उसे अपने लंड महसूस करा दो। फिर तो वो खुद ही अपनी चूत खोल देगी आपके लिए.."
पूजा की बात सुन मैं शर्मा सी गई और उसकी पीठ पर एक चपत लगा दी। वैसे पूजा भी सही ही कह रही थी, मैं भी तो अंकल से चुदने के लिए काफी बेसब्र हो गई अब।
"थैंक्स पूजा, समय मिलते ही आ जाऊँगा मैं। अभी रख रहा हूँ, एक मीटिंग में जाना है। बाहर सब इंतजार कर रहे हैं।" अंकल कहते हुए फोन रख दिए। पूजा फोन कटते ही बोली,"शाली, मारती क्यों है।"
"ऐसे क्यों बोल रही थी जो मार खाती है।" मैं मुस्कुराती हुई बोली।
"गलत थोड़े ही कह रही थी जो मारती हो।" पूजा भी कहते हुए हँस दी।
"अच्छा बाबा... छोड़ो ये सब और नीचे चलो। अँधेरा होने वाली है।" मैं बातों को ज्यादा ना बढ़ाते हुए कहने लगी।
पूजा हँसती हुई बिना कुछ नीचे की तरफ चल दी। अचानक वो रुकी और बोली,"भाभी,उस छत पर देखो।"
अब तक हम दोनों जहाँ पर थे, वहाँ से वो छत नहीं दिख रही थी क्योंकि पानी टंकी की दूसरी तरफ थे हम दोनों। मैं उधर नजर दौड़ाई तो देखते ही मेरी आँखे फटी की फटी रह गई।

नई नई शादी शुदा जोड़े खुली छत पर बेफिक्र हो सेक्स करने में मग्न थे। लड़की छत की रेलिँग के सहारे खड़ी पीछे की तरफ सिर की हुई थी और लड़का उसकी नंगी दोनों चुची पकड़ तेज-2 धक्के लगाए जा रहा था। हे भगवान, कितनी बेशर्म हो दोनों चुदाई कर रहे हैं। अगल बगल की छत की तरफ देखी तो कई और भी लोग थे जो उसे मुँह खोले एकटक देखे जा रहे थे। मैं शर्म के मारे पूजा को पकड़ते हुए नीचे की भागी। पूजा हँसते हुए बोली,"अरे भाभी, कर वे दोनों रहे हैं और शर्म आपको लग रही है। ये तो उनका लगभग रोज का काम है।"
मैं हँसती हुई बोली,"चल नीचे, मुझे इतनी बेशर्म नहीं बननी।"
"अरे मेरी लाडो, बेशर्म नहीं बनेगी तो मजे कैसे लेगी? वैसे अंकल से ढंग से चुद गई तो कितनी बड़ी बेशर्म बनेगी, वो तो समय ही बताएगी" पूजा अब साथ चलते हुए बोली। मैं चुपचाप पूजा की बात सुन मुस्कुरा ली और गेट खोलती अंदर आ गई। मेरी चूत काफी देर से पानी छोड़े जा रही थी तो झड़ने के ख्याल से बाथरुम में घुस गई। जब फ्रेश हो निकली तो पूजा चिढाती हुई बोली,"लगता है अब अंकल को जल्द ही बुलाना पड़ेगा। मेरी भाभी की गुफा से कुछ ज्यादा ही नदी बहने लगती है।"
"हाँ हाँ.. जल्द बुला ले वर्ना कहीं तुम नदी में बह नहीं जाओ।"मैं भी तैश में बोल हँस पड़ी। चूँकि अब ज्यादा शर्म करने से कुछ फायदा नहीं थी। पूजा भी मेरी बात जोर से हँस पड़ी।
फिर हम किचन का काम करने लगी और पूजा पढ़ने चली गई। कुछ ही देर में श्याम भी आ गए। फिर रात का खाना खा हम लोग सो गए। रात में श्याम ने जम के चुदाई की, मैं भी कई बार झड़ी। पर अब तो मैं दर्द के साथ चुदाई करने की सोच रखने लगी थी, जो कि भैया ने दिए थे। खैर चुदाई के बाद सपनों की दुनिया में खोती सो गई।
सुबह 5 बजे मेरी नींद खुल गई। पूजा और श्याम अभी भी सो रहे थे। अगर रात में हमें चुदाई की दर्द मिलती तो शायद मेरी भी नींद नहीं खुलती। श्याम को जगाए बिना मैं उठी और बालकनी में ताजी हवा खाने के निकल चली आई। कुछ ही देर बाद एक दूधवाला में साइकिल से आते हुए हमारी मेन गेट के पास आकर रुक गया और गेट पर लगी घंटी दबा दिया। ओह ये तो मेरे ही फ्लैट की घंटी दबा रहा था। मैं चौँकती हुई उसकी तरफ देखी। वो अब अपना सिर हमारी फ्लैट की तरफ उठा देखने लगा। मुझे देखते ही वो बोला,"मेमसाब दूध।"
मैं बिना कुछ बोले हाँ में सिर हिलाती अंदर से बर्तन ली और निकल गई।गेट खोल बर्तन उसकी तरफ बढ़ा दी। उसने दूध डालते हुए बोला,"मेमसाब, अब लगता है मुझे सुबह सुबह ज्यादा चीखने या घंटी दबाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"
मैं थोड़ी आश्चर्य से उसकी तरफ देखने लगी।
"मेमसाब,आपके वो साहब और वो छोटी बिटिया दोनों कुंभकर्ण के भी बाप हैं। रोज 10 बार चीखता तब जाकर उनकी नींद खुलती थी।" दूधवाला अपनी बातें कहते हुए हँस दिया। मैं भी उसकी बात पर हँस दी।
"लो बेटा, दूध लो।"दूध देते हुए वो अपनी साइकिल पर सवार हो गया और चल दिया।
मैं तो सोच में पड़ गई कि अक्सर सुनती रहती थी कि शहर में बड़े-2 घर की औरतों को दूधवाला अक्सर फँसा लेता है। पर यहाँ तो मेरे साथ कुछ और ही देखने मिल गई। कितने अच्छे स्वभाव का था ये। इन्हीं कुछ अच्छे लोगों की बदौलत तो ये दुनिया टिकी हुई है वर्ना.....।
तभी तेज आवाजोँ में गाना बजाती हुई एक ऑटो आई और ठीक मेरे सामने रुक गई। मैं आश्चर्य से उस ऑटो की तरफ देखी। ओह ये तो वही था जो हमें कल छोड़ने आया था। वो अपनी वही कल वाली हरकत करते हुए अपना लंड मसलते हुए जीभ फेर रहा था। मेरी तो सुबह-2 मूड खराब हो गई। मैं तेजी से गेट बंद की और अपने फ्लैट की तरफ बढ़ गई।
उसके बाद घर में ज्यादा कुछ नहीं हुई। एक अच्छी कामकाजी गृहिणी की तरह सारे काम की। श्याम तैयार हो ड्यूटी पर चले गए और पूजा कॉलेज।

मैं भी फ्रेश हो खाना खाई और आराम करने चली गई। दिन में करीब 2 बजे पूजा आई। आते ही बोली,"भाभी, जल्दी तैयार हो जाओ। बाहर घूमने कहीं चलते हैं।"
"क्या?"
"हाँ, घर में ज्यादा रहेगी तो बोर हो जाएगी। और भैया से मैं पहले ही वादा कर चुकी हूँ कि भाभी को रोज बाहर घुमाने ले जाऊंगी।" पूजा फ्रेश होने बाथरुम में घुसती हुई बोली। मैं उसकी और श्याम के बीच हुई वादे सुन हँस पड़ी।
"अच्छा बाबा। पहले नाश्ता तो कर लो।" मैं भी अपने रूम की तरफ बढ़ते हुए बोली।
पूजा OK कहती हुई निकली और नाश्ता निकाल करने लगी। मैं भी कुछ ही देर में एक अच्छी सी साड़ी पहन तैयार हो गई थी। पूजा भी काले रंग की जींस और सफेद रंग की टीशर्ट पहनी थी जो पूजा पर काफी अच्छी लग रही थी।
फ्लैट लॉक की और हम दोनों बाहर निकल गई। हम लोग मेन रोड से तकरीबन 1 किमी अंदर रहते थे तो इधर कोई सवारी इक्का-दुक्का ही आती थी। हम दोनों पैदल ही बातें करती मेन रोड की तरफ बढ़ने लगी।
तभी मेन रोड की तरफ से एक ऑटो आई और हम दोनों के ठीक सामने रुक गई।
"मैडम, स्टेशन चलना है क्या?"
ओह गॉड, ये तो यही ड्राइवर था सुबह वाला। पता नहीं कहाँ से बार-2 आ टपकता है साला। तब तक पूजा जवाब देती हुई बोली,"नहीं,बोरिँग रोड चलोगे क्या?"
"ठीक है मैडम, बैठिए।" कहते हुए उसने ऑटो हम दोनों के काफी करीब ला खड़ी कर दी। पूजा बढ़ते हुए चढ़ गई, मैं तो चढना नहीं चाहती थी पर क्या करती। मन ही मन गाली देती मैं भी चढ़ गई।
तभी मेरी नजर ऑटो के दोनों साइड मिरर पर पड़ी। ओह गॉड, एक मिरर मेरी चुची की तरफ थी जबकि दूसरी पूजा की चुची पर टिकी थी। मेरी तो खून खौल गई। दो टके की ड्राइवर की इतनी हिम्मत। किसी तरह खुद पर काबू करते हुए एक शरीफ लड़की की तरह अपनी नजरें दूसरी तरफ कर ली। क्यों बेवजह इस कमीने के मुँह लग खुद को नीच साबित करती।
कोई 20 मिनट बाद पूजा एक लेडिज ब्यूटी पॉर्लर के पास रोकने बोली। ऑटो रुकते ही मैं तेजी से नीचे उतर गई। पूजा भी उतरते हुए उसे पैसे दी और मुस्कुराते हुए बोली,"भाभी, ये सब तो यहाँ सब के साथ होती है। आप भी आदत डाल लो और मजे करो। कौन सा वो हमें चोद रहा था,बस चुची ही तो देख रहा था।"

मैं तो पूजा की बात सुनते ही शॉक हो गई। इतनी बेहूदा हरकतों को बस नॉर्मल कह रही थी। खैर मैं सिर हिलाती पूजा के साथ चल दी।
"भाभी,ये यहाँ की सबसे अच्छी पॉर्लर है। बड़ी-2 घर की लेडिज यहाँ ही आती है। कॉलेज की एक दोस्त इसके बारे में बताई थी।"पूजा कहती हुई सीढ़ी चढती हुई ऊपर चलने लगी। पूजा की बातों सुनते हुए मैं भी बढ़ रही थी। दिखने में तो काफी अच्छी लग रही थी।
कुछ ही देर में हम दोनों ब्यूटी पॉर्लर के अंदर थी। बेहद ही आधुनिक और उम्दा वर्ग की पॉर्लर लग रही थी। अंदर 4 औरतें थी जिसमें 2 तो काम कर रही थी और 2 गप्पे लड़ा रही थी। हम दोनों पर नजर पड़ते ही उनमें से एक उठी और बोली,"आइये मैडम, इधर आ जाइये।" हम दोनों की नजर उस तरफ गई जहाँ दो कुर्सी लगी थी जो कि काफी High classes Chair थी। पूजा के साथ मैं भी कुर्सी पर बैठ गई।
"कहिए मैडम?" पूजा के पास एक लेडिज खड़ी होती पूछी।
"मैम, बाल एडजस्ट कर कट कर दीजिए,फिर Face wash।" पूजा कुर्सी पर पीछे की तरफ लेटती हुई बोली।
"और हाँ, भाभी की सिर्फ Face....। बाल तो इनके काफी अच्छे ही हैं।"पूजा मेरी तरफ खड़ी लेडिज को बताती हुई बोली। पूजा की बात सुनते ही दोनों लेडिज अपने अपने काम में व्यस्त हो गई।अगले कुछ ही देर में बगल वाली दोनों लेडिज अपना काम करवा चुकी थी। वे दोनों बिल पे करती हुई निकल गई। उनके साथ दो वर्कर भी निकल गई शायद कुछ होगी। अब सिर्फ हम दोनों थी पॉर्लर में।
"नई-2 आई हैं क्या पटना में?" पूजा के बाल कट करती हुई वो लेडिज पूछी।
"जी हाँ, मैं तो पिछले महीने ही आई थी पर ये मेरी भाभी कल आई हैं।" पूजा उनकी बातों का जवाब देते हुए बोली।
"ओह, गुड! यहाँ कहाँ रहती है आप लोग"
"मैम,हम लोग आशियाना में रहते हैं। मेरे भैया यहाँ रेलवे में जॉब करते हैं।"
"Good... आप क्या करती हैं मिस....।"
"पूजा! और ये मेरी भाभी सीता। मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ। वो वीमेँस कॉलेज में भूगोल से B.A. कर रही हूँ।" पूजा लेटी-2 मेरी तरफ इशारा करती हुई बोली। मैं भी उसकी बात सुन एक नजर पूजा की तरफ दौड़ाई,फिर सीधी कर ली।
"काफी अच्छे नाम हैं आप दोनों के। मैं कोमल वर्मा हूँ, यहाँ आने वाली हर लेडिज मुझे कोमल दीदी कहकर बुलाती हैं। साथ में इस पॉर्लर की मालकिन भी हूँ। और ये मेरी कॉलेज दोस्त हैं जो कि मेरे काम में सहायता करने आती हैं।" अपना परिचय देते हुए वो लेडिज बोली।
मालकिन सुनते ही मेरी नजर एक बार फिर मुड़ गई। कोई 40 साल की एक भरी हुई शरीर की भी मालकिन थी। थोड़ी मोटी जरूर थी पर उतनी भी नहीं कि कोई उन्हें मोटी कह दे। रंग रूप में भी कोई कमी नहीं थी। उनके बाल कंधे तक ही आती थी। चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। और उनके एक हाथों में कलाई तक चूड़ी भरी हुई थी जबकि दूसरी में सिर्फ एक पतली सी कंगन थी। पहनावा भी काफी High थी।
"थैंक्स कोमल दीदी, आपसे मिल के हमें काफी खुशी हुई।"तभी पूजा कोमल दीदी की तरफ हाथ बढ़ा दी। कोमल दीदी भी मुस्कुरा के हाथ मिलाई।
तभी कोमल दीदी मेरी तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोली,"अरे आप भी पहली बार ही मेरी पॉर्लर में आई हैं तो कम से कम दोस्ती तो कर लीजिए।"
मैं भी हँसती हुई हाथ मिलाई और थैंक्स बोली। तब तक बाल एडजस्ट कर कट कर चुकी थी और Face पे अलग-2 क्रीम लगाने लगी।
"अच्छा पूजा, अगर बुरा नहीं मानोगी तो एक बात पुछूँ" कोमल दीदी बात करते हुए अपने हाथ से क्रीम रगड़ने लगी। पूजा उनकी बात सुन हँसती हुई बोली,"अब दोस्ती कर ही लिए हैं तो बोलने में क्यों झिझकते हैं।"
"ओके पूजा! महीने में कितना कमा लेती हो।"
कोमल दीदी की बात सुन हम दोनों एक साथ चौँक गई।पूजा कोई जॉब तो करती नहीं फिर कैसे..?
"अरे दीदी,बताई तो थी कि मैं स्टूडेँट हूँ और अलग से कोई पॉर्ट टाइम जॉब करती भी नहीं हूँ।"पूजा जवाब देते हुए बोली।
कोमल दीदी बोली,"मैं 20 वर्षों से पॉर्लर चलाती हूँ। तो रोज ही मेरी मुलाकात अलग-2 लेडिज और लड़की से होती है। ऐसे में हर लेडिज चाहे वो जॉब करने वाली हो या कॉलेज जाने वाली लड़की,उसकी Figure देखते ही मालूम पड़ जाती है कि कौन कैसी है?"
हम दोनों ही ध्यान से कोमल दीदी की बात सुन रहे थे। कोमल दीदी आगे बोली,"और अब तो इतनी अनुभव हो ही गई है कि कौन सी लेडिज सिर्फ एक से सेक्स करती है या फिर अनेक से,बता ही सकती हूँ। तुम्हारी शरीर तो साफ-2 बता रही है कि इसके कई लोग मजे ले चुके हैं।" कहते हुए कोमल दीदी हँस दी। अब तक मेरे चेहरे से क्रीम साफ कर दी थी।मैं कभी पूजा की तरफ तो कभी कोमल दीदी की तरफ हैरानी भरी नजरों से देखी जा रही थी। पूजा के तो A.C. चलने के बावजूद पसीने निकल रहे थे। उसकी मुँह खुली की खुली रह गई इतनी बड़ी बात कोमल दीदी सिर्फ देख के ही कैसे बता दी।
"आप लोग टेँशन मत लीजिए। ये सब बातें यहाँ Secret रहती है। अब दोस्त जब बनी हैं तो हर एक अच्छी-बुरी बातें तो कर ही सकते हैं ना।"तभी कोमल दीदी की वर्कर दोस्त मेरे कंधे को दबाती हुई बोली जिसे कोमल दीदी भी हाँ करते हुए दिलाशा दी। आगे कोमल दीदी बिना कुछ कहे अपने काम में लगी रही,शायद वो पूजा के जवाब की इंतजार कर रही थी। पूरे रूम में जहाँ कुछ क्षण पहले पूजा चहक-2 के कोमल दीदी से बातें कर रही थी,वहीं अब उसकी तो हालत किसी गूंगी से भी बदतर हो गई थी। इधर मैं भी एक बूत बनी सिर्फ मन में कोमल दीदी के कहे हर शब्द अनेक सवाल पैदा कर रही थी। कुछ ही देर में मैं और पूजा को काम खत्म होने की जानकारी कोमल दीदी ने दी। कोमल दीदी बिल मेरी तरफ बढ़ा दी,जिसे मैं अदा की और जल्द यहाँ से निकलने की सोची ताकि हमें या पूजा को उनकी और कोई बातें सुननी नहीं पड़े। पूजा तब तक पॉर्लर से बाहर निकल गेट के पास रुक मेरा इंतजार करने लगी। मैं उसके पीछे चलती जैसे ही गेट के पास पहुँची कि कोमल दीदी पीछे से आवाज दी,"सीता...."
मेरे कदम ज्यों के त्यों रुक गए। दिल की धड़कन काफी तेज हो गई कि पता नहीं अब ये मेरे बारे में क्या विस्फोट करने वाली है। कहीं.....?

कोमल दीदी खुद ही चलकर मेरे पास आ गई।
"सीता,मैं आप लोगों की दिल दुखाना नहीं चाहती थी। मैं तो बस एक दोस्त की तरह जुड़ना चाहती हूँ। अगर आप लोगों को मेरी बातों से ठेस पहुँची हो तो प्लीज माफ कर देना। पर प्लीज दोस्ती मत छोड़ना।"
मैं उन्हें एक टक देखी जा रही थी। उनकी आँखें बोलते-2 नम सी हो गई थी। उनकी हालत देख मैं भी भावुक सी हो गई। फिर वो अपनी आँखें पोँछती बोली,"ये लो मेरी कार्ड, अगर अपनी इस नादान से बात करने की इच्छा हुई तो बेहिचक फोन करना।"
मैं अब उन्हें ज्यादा देर तक ऐसी देख नहीं पा रही थी और जल्द से जल्द निकलना चाहती थी। मैंने कार्ड ली और ओके कहते हुए सीढ़ी से नीचे उतरने लगी।
पूरे रास्ते गुमशुम सी बैठी रही, मानोँ साँप छू गई हो। कई बार बोलने की कोशिश भी की पर उसने कोई जवाब ही नहीं दी। घर आते ही उसने रूम में घुस कमरे लॉक कर ली। मैं भी कुछ देर टाइम पास करने टीवी के सामने बैठ गई।
बैठे-2 नौ कब बज गए, मालूम ही नहीं पड़ी। श्याम भी आ गए थे। जल्दी से खाना बनाई और श्याम को खाना खिला दी। फिर पूजा को आवाज दी तो वो भी आई और चुपचाप खाना खा चली गई। मैं भी सोने चली गई।
अगली सुबह फिर वही कल वाली बात। दूध लेने के बाद उस ऑटो वाले की बेहूदा हरकतेँ देख के भागना। मन ही मन सोचने लगी कि ये ऑटो वाला रोज कैसे हमारी गली में आ जाता है।कहीं वो सिर्फ मुझे ही देखने ही नहीं आता है।
नहीं. नहीं. शायद घर होगा आगे। तभी तो रोज इधर से ही आता है। कल भी तो दोपहर में इधर की तरफ ही तो आ रहा था। पर मुझे देखते ही वापस हो गया था। खैर मैं अपने सिर को झटकते हुए उसकी बातों को दिमाग से निकाल देना चाहती थी।
सुबह भी पूजा कुछ नहीं बोल रही थी। नाश्ता करने के बाद वो कॉलेज निकल गई। श्याम भी कुछ देर में ड्यूटी पर निकल गए। मैं भी सारे काम निपटा आराम करने रूम में चली आई पर दिल में अब बेचैनी सी होने लगी थी। पता नहीं पूजा कुछ क्यों नहीं बोल रही है। अगर उसने नहीं बोली कभी इस बारे में तो पता नहीं मैं खुद को कैसे मना पाऊंगी। कैसे अपने दिल को समझा पाऊंगी। इन्हीं सब बातों में खोती कब सो गई मालूम नहीं।
पूजा कॉलेज से आ गई थी और नाश्ता कर रही थी, तब मेरी नींद खुली। मैं उसकी तरफ एक नजर डाली और बाथरुम की तरफ चली गई। फ्रेश होने के बाद जैसे ही निकली, पूजा बोली,"भाभी, अब आपको क्या हो गया जो मुँह फेर रही हो।"
मैं ठिठकती हुई रुक गई और पूजा की तरफ मुड़ के बोली,"मुझे क्या होगी! खुद ही कल से ऐसे चुप हैं मानोँ जैसे आसमान गिर गई हो तेरे सिर पे।"
मैं शिकायत करते हुए मुस्कुरा दी। पूजा तब तक नाश्ता कर चुकी थी। हाथ साफ करती हुई बोली,"भाभी, मैं उनकी बातों से बिल्कुल नाराज नहीं थी क्योंकि वो झूठ तो नहीं कह रही थी।" मैं भी पूजा की बातों को हाँ में सहमति दी। पूजा मेरे निकट आ गई और बोली," बस थोड़ी सी डर गई थी कि इन शहरी लोगों का पता नहीं पैसों के लिए कब किसे हलाल कर दे।"
"मतलब......!"मैं चौंक कर पूजा को बात समझाने के लिए पूछी।
"मतलब ये कि कहीं वो हमें ब्लैक-मेल तो नहीं करने की सोच रही ये सब बातें कह कर। यहाँ तो रोज ऐसी बातें होती रहती है।"पूजा मुझे समझाते हुए बोली।
मैं तो हैरान सी रह गई पूजा की सोच देख कर। किसी भी बात को तुरंत ही अंत तक ले जाकर सोचती है कि परिणाम क्या होगी इसकी।
मेरी दिमाग में ये बातें आते ही आगे की सोच सिहर गई।तभी पूजा बोली,"पर अब टेँशन लेने की कोई बात नहीं है भाभी।"
"क्यों?"मैं तो पूजा की हर बात सुन परेशान हुई जा रही थी। कभी कुछ कहती, कभी कुछ।
"आज कॉलेज में उसी दोस्त को सारी बात बताई थी। वो तो पहले खूब हँसी फिर बोली कि वो फायदा उठाने वाली लेडिज नहीं हैं। जहाँ तक वो एक दोस्त की तरह हर मुसीबत में हर वक्त साथ देती है।"
मैं भी पूजा की बात से कोमल दीदी को याद कर मुस्कुरा पड़ी।
"वो तो ठीक है पर अगर गाँव की देख उनकी नेचर बाद में बदल गई तो...।"अब मेरे मन में भी थोड़ी शंका हुई।
"भाभी, मैं ये कहाँ कह रही कि उनसे दोस्ती कर ही लो। जस्ट उनके बारे में बता रही हूँ और आप हो कि...."
मेरी बात पर पूजा हैरानी भरी आवाजोँ में बोली। मैं मुस्कुराती हुई बोली,"अच्छा छोड़ ये सब। चलो छत पर थोड़ी लाइव देखते हैं।"
"Wow मेरी जानेमन! कुछ तो बोली। पर अभी तो धूप निकली ही है और लाइव शुरू होने में करीब 30 मिनट बचे हैं।" पूजा तो ऐसे समझाने लगी कि मानो वो तो उनका पूरा टाइम टेबल जानती है।
"अच्छा चलो ना फिर भी। कुछ देर यूँ ही टाइमपास करेंगे।" मैं पुनः जोर देते हुए बोली।
पूजा मुस्कुरा दी और हामी भरते हुए छत की तरफ चल दी। अब पूजा को क्या पता कि मैं तो कुछ और ही देखने जा रही थी। गेट लॉक की और कुछ ही देर में हम दोनों छत पर थे।
मेरी नजर तो सबसे पहले उस छत की तरफ गई जहाँ कल लाइव शो चल रही थी। वहाँ तो अभी एक भी लोग नहीं थे। मैं फिर दूसरी तरफ देखने लगी। मेन रोड की तरफ देखी तो एक से एक बिल्डिँग नजर आ रही थी। यहाँ से मेनरोड नजर तो नहीं आ रही थी पर वहाँ सड़कों पर दौड़ रही गाड़ियों की तेज आवाजें जरूर सुनाई दे रही थी।
दूसरी तरफ नजर दौड़ाई तो गली आगे जा कर बाएँ और दाएँ की मुड़ गई थी। इधर की तरफ घर भी धीरे-धीरे छोटे होते जा रहे थे आगे।
"पूजा,ये सड़क आगे जाकर खत्म हो जाती है क्या?" पूजा को अपनी बगल में खड़ी देख पूछी।
"नहीं भाभी,ये सड़क आगे उस कॉलोनी से होती हुई आगे पुनः मेनरोड पर निकल जाती है।"पूजा हल्के शब्दों में बता दी।
मेरी नजर दोनों कॉलोनी की तरफ गई जहाँ कोई भी घर दो मंजिल से ज्यादा की नहीं थी।कुछ घर तो बिल्कुल गाँवों की झोपड़ी की तरह थी। तभी पूजा आगे बोली,"भाभी, इन दोनों कॉलोनी में सिर्फ कम आय वाले लोग रहते हैं जैसे कि मजदूर,दूधवाला, ऑटोवाला वगैरह-2। यहाँ मेन रोड से जितनी अंदर जाओगी, वैसी ही लोगों की रैंक भी कम होती जाती है।"
पूजा की बात सुन हम दोनों इस वर्गीकरण पर हँस पड़े।

मैं छत पर खड़ी उस कॉलोनी की तरफ देख रही थी या कहो किसी को ढूँढने की कोशिश कर रही थी। पूजा मेरी बगल से निकल दूसरी तरफ चली गई।
मैं मन में सोचे जा रही थी कि कहाँ पर होगी उस ऑटो वाले का घर?
अचानक मैं अपने सिर को झटकी... छिः.. पता नहीं मेरे अंदर उस मामूली ड्राइवर कैसे आ गया। ड्राइवर तो था पर था वो मेरी हुस्न का दीवाना... ड्राइवर तो सब दिन अपनी बीबी या रण्डी को ही चोदता है तो उसकी ऐसी हरकत तो वाजिब थी। अगले ही पल मैं एक बार सोचनी लग गई..
ऑटो ड्राइवर है तो किसी झोपड़ी में ही रहता होगा। घर में उसकी बीबी-बच्चे होंगे। दिन भर कमा कर आता होगा थका हुआ और खाना खा सो जाता होगा। नहीं.. नहीं.. दिखने में तो काफी हिष्ट-पुष्ट है.. जरूर अपनी बीबी को जम के चोदता होगा फिर सोता होगा।घनी-2 मूँछेँ,सिर पर गमछी लपेटे,कमीज की सिर्फ नीचे की एक बटन लगी, लाल-2 आँखें, मुँह में गुटखा चबाए भयानक लग रहा था। और किसी लड़की को देखता तो मानोँ अगर वो लड़की अकेली मिल जाए तो उसी जगह पटक के चोद ले। उसकी तरह उसकी बीबी भी काली होगी पर काफी सेक्सी होगी.. क्योंकि काले लोगों में सेक्स कूट-2 के भरी होती है। दोनों जब सेक्स करते होंगे तो पड़ोसी की निश्चित ही नींद टूट जाती होगी...
और ऐसी बातें सोचते-2 मेरे होंठों पर मुस्कान तैर गई।
"ओ भाभी,कहाँ खोई हुई है? आपके फोन में किसी का मैसेज आया है.."तभी दूसरी तरफ से आई पूजा की आवाज सुन मैं ख्वाबोँ की दुनिया से बाहर निकली। पूजा की तरफ नजर दौड़ा एक छोटी सी स्माइल दी और मैसेज देखने लगी।
"कुछ दोस्त जिंदगी में इस कदर शामिल हो जाते हैं,
अगर भुलाना चाहो तो और याद आते हैं।
बस जाते हैं वो दिल में इस कदर कि,
आँखें बंद करो तो सामने नजर आते हैं।।"
मैसेज पढ़ मेरी होंठों पर मुस्कान आ गई। पूजा मुझे मुस्कुराते देख पास आती हुई बोली,"क्यों मेरी रानी, बड़ी चवनिया मुस्कान दे रही है मैसेज देख कर। जरा हमें भी तो दिखाओ किसके हैं।"
मैं अभी भी मुस्कुराए जा रही थी।पूजा मेरे हाथों से फोन ले पहले नम्बर देखी,फिर हँसते हुए जोर-जोर से मैसेज पढ़ने लगी। मेरी तो हँसी के साथ-2 शर्म भी आने लगी थी। जैसे ही मैसेज खत्म हुई पूजा फोन मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली,"हाय, अपने इस दीवाने को जल्दी से उत्तर दो।"
मैं ना में सिर हिला दी। पूजा चौँकती हुई बोली,"ओ मेरी सती सावित्री, ऐसे कैसे चलेगा। जल्दी से जवाब दे वर्ना तुम जिंदगी भर अंकल के लंड को याद करने में ही गुजार दोगी। समझी कुछ."

पूजा की बात सुनते ही मैं उसके हाथ से फोन ली और बोली,"बड़ी आई मैसेज-2 खेलने वाली.. मैं नहीं खेलने वाली।"
और फोन लेते हुए नम्बर डायल कर फोन कान में लगा ली। ये देखते ही पूजा खुशी से उछल पड़ी और बोली," Woww! भाभी, तुम तो बड़ी कमीनी निकली। मैं कहाँ मैसेज करने की सोच रही और तुम तो सीधी.."
पूजा अपनी बात पूरी भी नहीं कर सकी कि तब तक मैंने उसके मुँह को हाथों से बंद कर दी।
"प्रणाम अंकल.." फोन रिसीव होते ही मैं बोली।
"जीती रहो बेटा, कैसी हो? नई जगह पर मन तो लग रहा है ना।पूजा जब तक कॉलेज रहती तब तक तो अकेली बोर हो जाती होगी।"अंकल एक ही बार में कई सवाल कर गए।
मैं हँसती हुई बोली,"बिल्कुल ठीक हूँ अंकल। और यहाँ हम दोनों काफी मजे में हैं.. हाँ कभी कभी बोर जरूर हो जाती।"
"ओह मेरी बच्ची.. तो तुम फोन क्यों नहीं कर लेती। बात कर लेगी तो थोड़ी रिलेक्स हो जाएगी और बाहर भी घूमने चली जाया करना।"अंकल तरस खाते हुए बोले।इधर पूजा गौर से हम दोनों की बातें सुन रही थी।
"जी अंकल।"मैं अंकल की बातों को समर्थन देते हुए बोली।
"अंकल, आप हमसे मिलने कब आओगे?" पूजा की नाचती नजरों में देखती मुस्कुराती हुई बोली। पूजा मेरी इस सवाल पर Wow कहने की मुद्रा में अपनी होंठ कर ली।
"अरे सीता बेटा, मैं खुद ही आपसे मिलने के लिए कितना तरस रहा हूँ; तुम सोच नहीं सकती। कल तक किसी तरह समय निकाल कर आ जाऊँगा।"अंकल के हर शब्दों में बेकरारी साफ-2 झलक रही थी।
"ठीक है अंकल,मैं इंतजार करूँगी।" मैं अंकल की बेसब्री पर मुस्कुराती हुई थोड़े और जख्म दे दी।
"ओफ्फ.... थैंक्स बेटा.. मन तो नहीं है पर अभी एक जरूरी मीटिंग में जाना है इसलिए रख रहा हूँ। फुर्सत में आराम से बात करेंगे।" अंकल के बुझे हुए शब्द मेरे कानों में पड़ी तो मैं झूम सी गई। अंकल तो सच में पूरे फिदा थे।
"ठीक है अंकल पर...."मैं अंकल को लगभग रोकती हुई बोली। इधर पूजा मेरी तरफ आँखें फाड़ कर देखने लगी कि अब क्या कहने वाली है।
"पर क्या बेटा?"अंकल एक बार फिर जोश में आते हुए बोले।मैं कुछ देर खामोश सी हो गई। पूजा भी मुझे समझने की कोशिश करती देखी जा रही थी।
"हैल्लो.. सीता बेटा.. अरे बोलो ना.. कुछ दिक्कत है या कोई बात है, बेहिचक बोलो।"अंकल की आवाजें एक बार फिर गूँजी। मैं थोड़ी हकलाती हुई बोली,"वो अं..अंकल.. मुझे उस दिन वाला प्यार चाहिए था आपसे.."
मैं अब सच में थोड़ी शर्मा गई कहते हुए और साथ में मेरी चूत भी। पूजा तो अपने दोनों हाथ से मुँह ढँक दबी हुई हँसी हँसने लगी। वो दोनों समझ गए थे कि मैं चुम्मा माँग रही हूँ।मैं अपने चेहरे पर आई पसीने साफ करती हुई पूजा को चुप रहने की इशारा की।
"अम्म..म.. वो पूजा नहीं है क्या घर पर।" अंकल भी थोड़े डर गए और हकलाते हुए बोले। अब हँसी निकालने की बारी मेरी थी अंकल की हालत देख,पर किसी तरह काबू पाते हुए नाराज भरे शब्दों में बोली,"अंकल,पूजा घर पर रहती तो थोड़े ही ना माँगती। वो अपने दोस्त के साथ बाहर गई है..प्लीज अंकलललल..."
पूजा की तो हँसी से हालत खराब हो रही थी। वो वहीं अपनी पेट पकड़ बैठ गई। पूजा घर पर नहीं है सुन अंकल थोड़ी राहत की साँस लिए और नॉर्मल होने की कोशिश करते हुए बोले,"अच्छा बेटा, अभी तो जल्दी में हूँ वर्ना ढेर सारी देता। कहाँ पर दूँ, जल्दी बोलो."
मैं थोड़ी इठलाती हुई बोली,"अंकल..जहाँ पर उस दिन दिए थे।"
"वो तो ठीक है मेरी रानी बिटिया, पर अगर उस जगह की नाम बता देती तो और भी अच्छे ढंग से देता।"अंकल थोड़े से सकुचाते हुए बोले शायद उन्हें झिझक हो रही थी। पर कह तो सही रहे थे। कोई लड़की अगर खुल के सेक्सी बातें बोलती है तो पार्टनर दुगुने उत्साह से मजे दिलाता है।
मैं अब ज्यादा वक्त नहीं लेना चाहती थी क्योंकि अब मेरी भी चूत फव्वारे छोड़ने लगी थी।
अबकी बार तो मैं सच में सिहर गई और शर्माते हुए बोली," ज..जी अंकल वो मेरी होंठों पर..."
इतनी ही कह पाई कि मेरी साँसें तेज होने लगी थी। और पूजा तो हँसते-2 एक तरफ लुढक चुकी थी। दूसरी तरफ अंकल एक मुख से एक आहहह निकली और घबराई हुई शब्दों में बोले," बेटा, होंठ नहीं कहो... प्यारी-2, सुंदर, रसीली और शहद जैसी मीठी होंठ कहो। अच्छा अब जरा आप अपने होंठों पर मोबाइल रखिए.."
मैं हल्की हँसी हँसती हुई बोली.. "जी अंकल, रख दी।"
तभी अंकल की एक जोरदार और लम्बी सी चुम्मी की तेज आवाज मोबाइल से निकली...
और पीछे से अंकल हल्के शब्दों में बोले,"आह मेरी रानी"
मैं समझ गई कि अंकल अब पूरे जोश में आ गए हैं.. मैं हल्की हँसी के साथ मुस्कुराती हुई बोली,"थैंक्स अंकल,अब आप जाइए.. और जल्दी ही मिलने आइएगा। उम्मुआहहहह...." इस बार अंकल को एक झटके देती हुई मैं भी उतावला हो गई थी.. अंकल तो बदहवास से कहीं खो गए। उनकी तरफ से कोई आवाज नहीं सुन मैं हैल्लो की तो अंकल की सिर्फ सिसकारि निकल सकी। मैं तेजी से बाय अंकल कहती हुई फोन रख दी। फोन रखने के साथ ही हम दोनों की 15 मिनट की रुकी हुई हँसी एक साथ गूँज उठी...

हम दोनों की हँसी रुकते नहीं रुक रही थी। वहीं बैठ किसी तरह हँसी रोकने की कोशिश कर रही थी। तभी पूजा की नजर उस तरफ गई जहाँ वही जोड़ा खुली छत पर सेक्स कर रही थी। पूजा देखते ही बोली,"क्या यार, रोज-2 ऐसे करते मन नहीं उबता क्या? कभी तो जगह,पोज बदला करो। इससे अच्छी मस्ती तो हम लोग कर रहे हैं।"पूजा उसकी तरफ देख कहते हुए हँस पड़ी।
कुछ देर यूँ ही छत पर टहलने के बाद हम दोनों नीचे आ गए। फिर रात का खाना खा सो गए।
अगले दिन सुबह दूध ले वापस अपने फ्लैट की तरफ आ रही थी। तभी रोज की तरह वही ऑटो वाला गाना बजाते हुए आ रहा था। पता नहीं मन में क्या सुझी? पहली सीढ़ी पर रखी पैर वापस खींचते हुए बाहर उस ऑटो की तरफ देखने लगी। रोज की तरह ऑटो रुकी और ड्राइवर अपने लंड मसलते हुए जीभ फेरने लगा। बिना किसी शर्म के मैं उसकी आँखों में देखे जा रही थी। तभी उस ड्राइवर ने फ्लाइंग किस मेरी तरफ उछाल दिया। ना चाहते हुए भी मैं मुस्कुरा पड़ी और वापस भागती हुई अपने फ्लैट में चली आई। मेरी साँसें तेज चलने लगी थी.. मैं किचन में खड़ी हँसते हुए साँसें पर काबू पाने की कोशिश करने लगी। मैं तो उसकी हिम्मत की कायल हो गई। कैसे वो बिना डर के पहले लंड मसल रहा था, फिर थोड़ी रिस्पांस मिलते ही फ्लाइंग किस दे बैठा। इसी तरह उसके बारे में सोचते किचन के काम में लग गई। रोज की तरह श्याम ड्यूटी,पूजा कॉलेज और मैं खाना खा के आराम करने चली गई।
दोपहर में करीब 1 बजे डोरबेल की आवाजें से मेरी नींद खुली। मैं तेजी से उठी और गेट खोली। सामने अंकल को देखते ही मैं चौंक पड़ी। अगले ही पल मैं संभलती हुई प्रणाम की। अंकल मेरी दोनों बाँहेँ पकड़ते हुए बोले,"अरे बेटा, दिल में रहने वाले लोग पैर नहीं छूते, बल्कि गले मिलते हैं।" कहते हुए अंकल अपने मजबूत बाँहों में मुझे समेट लिए। मैं भी सिमटती हुई अंकल के बाँहों में सिमट गई। सच अंकल के बाँहों में काफी सुकून मिल रही थी। कुछ देर किसी प्रेमी जोड़े की तरह लिपटी रहने के बाद मैं ऊपर उनकी आँखों में देखते हुए बोली,"यहीं पर से वापस जाएँगे क्या? अंदर चलिए ना....!"
मेरी बात सुन अंकल मेरी होंठों को हल्के से चूमते हुए बोले,"ओके बेटा,जैसी आपकी मर्जी।"
फिर हम दोनों अलग हुए और गेट बंद करते हुए अपने रूम की तरफ चल दी। अंकल भी मेरे पीछे आते हुए रूम में आए और सोफे पर बैठ गए। मैं फ्रिज से पानी की बोतल निकाल उनकी तरफ बढ़ा दी। बोतल पकड़ते हुए अंकल बोले,"सीता, खाना नहीं खाती क्या? कितनी दुबली हो गई। गाँव में थी तब अच्छी लगती थी। और पूजा कॉलेज से नहीं आई क्या?"
अंकल की बात सुन मैं हँसती हुई बोली,"अंकल मैं तो वैसी ही हूँ जैसी गाँव में थी। पूजा भी कुछ देर में आ जाएगी।" कहते हुए मैं किचन में आई और चाय बनाने लगी। जैसी की मुझे उम्मीद थी, अंकल अगले ही पल किचन में मौजूद थे। मैं मन ही मन मुस्कुरा दी और बिना मुड़े चाय बनाने में मग्न रही। पर शरीर में तो अंकल के अगले कदम को सोच झुरझुर्री आ गई थी। तभी अंकल पीछे से अपनी लंड मेरी गांड़ के ऊपर रखते हुए चिपक गए और मेरी बाल एक तरफ करते हुए कान की बाली अपने मुँह में भर लिए। मैं तो जोर से सिहर गई। ओफ्फ करती हुई कसमसाने लगी। उनकी गर्म साँसें सीधे मेरी सुर्ख गालोँ पर पड़ रही थी जिससे मैं कांप सी गई। अगले ही पल अंकल अपने हाथ मेरी साड़ी के नीचे होते हुए नंगी पेट पर रख दिए। मेरी तो हालत जल बिन मछली की तरह हो गई। मैं सिसकती हुई अंकल के सीने पर अपने सर टिका दी। मेरी आँखें मदहोशी में बंद हो चुकी थी और नीचे मेरी चूत रस बहाने लगी थी। तभी अंकल मेरी कान की बाली को मुँह से आजाद कर दिए। मेरी साँसें अब तेज चलने लगी कि पता नहीं अब अंकल क्या करेंगे। तभी अंकल अपना दूसरा हाथ मेरी चूत के ठीक बगल में रख दिए। मैं मस्ती के सागर में डूबती हुई अपने दोनों पैर सिकुड़ कर पीछे को हुई। पर पीछे से अंकल अपने लंड को तैनात किए हुए थे जो किसी काँटे की भाँति मेरी मांसल चूतड़ में धँस गई। अंकल की एक छोटी सी हँसी सुनाई दी जिससे मैं शर्मा गई। तभी अंकल चूत के पास रखे अपने हाथ धीरे-2 ऊपर की तरफ सरकाने लगे। हाथ थी तो साड़ी के ऊपर पर वो अपने जलवे मेरी रूहोँ को तक दिखा रही थी। अंकल बिना रुके अपने कड़क हाथ पेट के ऊपर से गुजारते जा रहे थे। जैसे ही हाथ मेरी चुची के निचले हिस्से को छुई, मैं तड़प के अपने हाथों से उन्हें रोकने की कोशिश की। पर मेरी हाथ क्या पूरे शरीर में थोड़ी भी ताकत नहीं रह गई थी कि अंकल को अब रोक सकूँ। अंकल मेरे हाथ सहित अपने हाथ मेरी चुची पर ऊपर की तरफ ले जाने लगे। मेरी चुची के ठीक बीचोँबीच आते ही उन्होंने अपने हाथ नचा दिए। मैं काम वासना में इतनी जल गई थी कि इसे बर्दाश्त नहीं कर पाई और चीखते हुए झड़ने लगी। मेरी पूरी शरीर कांपने लगी थी, जिसे अंकल तुरंत समझ गए और पेट पर रखे हाथ से मुझे कस के पकड़ लिए ताकि मैं उनके साथ खड़ी रह सकूँ। तब तक अंकल के हाथ मेरी चुची को रगड़ती हुई मेरी गाल तक पहुँच गई। फिर मेरी गालोँ को हल्के से घुमाते हुए अपने तरफ करने लगे। मेरी साँसे उखड़ने लगी। मैं चाह कर भी कुछ करने लायक नहीं बची थी। अगले ही क्षण मेरी कांपती होंठ पर उनके होंठ चिपक गए। उनके होंठ लगते ही मैं जन्नत में पहुँच गई। मैं एक बार झड़ने के बावजूद पुनः गर्म हो गई और आपा खोते हुए किस करने लगी। मेरी तरफ से अनुमति मिलते ही अंकल तेजी से किस करने लगे। अगले ही पल मेरी पेट पर रखे हाथ को सीधा मेरी चुची पर रख दिए। अब मैं सारी दुनिया भूल अपने रसीली होंठ के रस चुसवा रही थी। और अंकल भी बदहवास मेरी चुची मर्दन करते किस किए जा रहे थे और नीचे अपने लंड से हौले-2 धक्का दे रहे थे। गैस पर चढ़ी का तो पता नहीं जल के बची भी होगी या नहीं..
10 मिनट तक लगातार चुसाई के बाद भी हम दोनों अपनी जीभ से जीभ लड़ाते हुए किस किए जा रहे थे कि तभी "Please Open The Door" की आवाज सुनते ही अंकल से छिटकते हुए गेट की तरफ लपकी।

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